बुधवार, 10 दिसंबर 2014
रविवार, 7 दिसंबर 2014
२७०० दलित सफाई मज़दूरों की ऐतिहासिक जीत
२७०० दलित सफाई मज़दूरों की ऐतिहासिक जीत
हाल ही में मुंबई के २७०० दलित मज़दूरों ने मुंबई महानगरपालिका के खिलाफ एक ऐतिहासिक जीत दर्ज़ की है। इस लड़ाई की शुरुआत १९९७ में सफाई मज़दूरों ने कचरा वाहतूक श्रमिक संघ नामक यूनियन की अगुवाई में की। कचरा वाहतूक श्रमिक संघ मज़दूरों के हक़ में लड़ने वाली एक अग्रणी मज़दूर यूनियन है जिसकी स्थापना १९९७ में मुंबई के कुछ सफाई मज़दूरों ने कामरेड दीपक भालेराव तथा कामरेड मिलिंद रानाडे की अध्यक्ष्ता में की।
सभी सफाई मज़दूर मुंबई महानगर पालिका में पिछले आठ-नौ सालों से लगातार साफ़ सफाई का काम कर रहे है। परन्तु मुंबई महानगरपालिका ने उन्हें उनका कर्मचारी का हक़ न देकर उन्हें ठेका प्रथा पर रखा तथा मज़दूरों की और उनके परिवार वालों की जिंदगियों के साथ खिलवाड़ किया। इन मज़दूरों को सालों की मेहनत के बाद भी वेतन के नाम पर मुश्किल से किमान वेतन मिलता है। भविष्य निर्व्हा निधि, चिकित्सा सुविधा जैसी मुलभुत सुविधाओं के लिए ये मज़दूरों सालों से तरसते आ रहे है।
परन्तु बॉम्बे इंडस्ट्रियल कोर्ट के इस फैसले ने वर्षो से देश को स्वच्छ रखते आ रहे अमुक तथा अदृश्य पीड़ित सिपाहियों को न्याय देकर उन्हें तथा उनके बच्चों को एक नई जिंदगी प्रदान की है। कोर्ट ने मुंबई महानगरपालिका की ठेकेदारी प्रथा को "sham and bogus" बताया। यानी कि कोर्ट ने इसे केवल कागजी कार्यवाही बताया है। तथा इसे मज़दूरों को उनके अधिकारों से वंचित रखने का एक गैरकानूनी तरीका बताया है। कोर्ट ने मुंबई महानगरपालिका को लताड़ते हुए सभी मज़दूरों को नौकरी लगने के २४० दिन के बाद से स्थाई नौकरी देने का हुकुम दिया है। इससे सभी मज़दूरों को उनका पिछले आठ नौ साल का बकाया पैसा भी मिलेगा जो की हर मज़दूर के हक़ में कम से कम छः लाख रुपए आता है।
परन्तु अब देखना ये होगा मुंबई महानगर पालिका जो कि सालों से कानून को नजरअंदाज कर मज़दूरों को ठेका प्रथा पर रखती आई है कोर्ट के आदेश का कहां तक पालन करती है। या फिर दलित मज़दूरों की जिंदगियों के साथ ये खिलवाड़ जारी रखती है।
हाल ही में मुंबई के २७०० दलित मज़दूरों ने मुंबई महानगरपालिका के खिलाफ एक ऐतिहासिक जीत दर्ज़ की है। इस लड़ाई की शुरुआत १९९७ में सफाई मज़दूरों ने कचरा वाहतूक श्रमिक संघ नामक यूनियन की अगुवाई में की। कचरा वाहतूक श्रमिक संघ मज़दूरों के हक़ में लड़ने वाली एक अग्रणी मज़दूर यूनियन है जिसकी स्थापना १९९७ में मुंबई के कुछ सफाई मज़दूरों ने कामरेड दीपक भालेराव तथा कामरेड मिलिंद रानाडे की अध्यक्ष्ता में की।
सभी सफाई मज़दूर मुंबई महानगर पालिका में पिछले आठ-नौ सालों से लगातार साफ़ सफाई का काम कर रहे है। परन्तु मुंबई महानगरपालिका ने उन्हें उनका कर्मचारी का हक़ न देकर उन्हें ठेका प्रथा पर रखा तथा मज़दूरों की और उनके परिवार वालों की जिंदगियों के साथ खिलवाड़ किया। इन मज़दूरों को सालों की मेहनत के बाद भी वेतन के नाम पर मुश्किल से किमान वेतन मिलता है। भविष्य निर्व्हा निधि, चिकित्सा सुविधा जैसी मुलभुत सुविधाओं के लिए ये मज़दूरों सालों से तरसते आ रहे है।
परन्तु बॉम्बे इंडस्ट्रियल कोर्ट के इस फैसले ने वर्षो से देश को स्वच्छ रखते आ रहे अमुक तथा अदृश्य पीड़ित सिपाहियों को न्याय देकर उन्हें तथा उनके बच्चों को एक नई जिंदगी प्रदान की है। कोर्ट ने मुंबई महानगरपालिका की ठेकेदारी प्रथा को "sham and bogus" बताया। यानी कि कोर्ट ने इसे केवल कागजी कार्यवाही बताया है। तथा इसे मज़दूरों को उनके अधिकारों से वंचित रखने का एक गैरकानूनी तरीका बताया है। कोर्ट ने मुंबई महानगरपालिका को लताड़ते हुए सभी मज़दूरों को नौकरी लगने के २४० दिन के बाद से स्थाई नौकरी देने का हुकुम दिया है। इससे सभी मज़दूरों को उनका पिछले आठ नौ साल का बकाया पैसा भी मिलेगा जो की हर मज़दूर के हक़ में कम से कम छः लाख रुपए आता है।
परन्तु अब देखना ये होगा मुंबई महानगर पालिका जो कि सालों से कानून को नजरअंदाज कर मज़दूरों को ठेका प्रथा पर रखती आई है कोर्ट के आदेश का कहां तक पालन करती है। या फिर दलित मज़दूरों की जिंदगियों के साथ ये खिलवाड़ जारी रखती है।
शुक्रवार, 28 नवंबर 2014
शनिवार, 22 नवंबर 2014
गुरुवार, 20 नवंबर 2014
शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014
हम दोनों
तुम थोड़ी ठण्ड इधर करो
मैं थोड़ी धुप सरकाता हूँ।
थोड़ा-२ बाँट लेते है दोंनो।
तुम थोड़ी गिराओ झूठ की दीवारे
मैं थोड़ी सच्चाई बतलाता हूँ।
थोड़ा थोड़ा बाँट लेते है दोनों।
पुरानी यादें रुठने लगी है अब तो
आओ कुछ नई यादें बनाते है।
समय थोड़ा साथ बिताते है दोनों। - Shakti Hiranyagarbha
मैं थोड़ी धुप सरकाता हूँ।
थोड़ा-२ बाँट लेते है दोंनो।
तुम थोड़ी गिराओ झूठ की दीवारे
मैं थोड़ी सच्चाई बतलाता हूँ।
थोड़ा थोड़ा बाँट लेते है दोनों।
पुरानी यादें रुठने लगी है अब तो
आओ कुछ नई यादें बनाते है।
समय थोड़ा साथ बिताते है दोनों। - Shakti Hiranyagarbha
सच की सड़क
कहा था गांधीजी ने
सदा सच बोलो
पढ़ाया था बचपन में मास्टर जी ने ये
सत्य कड़वा होता है,
सत्य की सदैव जीत होती है,
किताबो में पढ़ा था हमने।
इसी कवायद से काफी कम झूट बोला हमने
फलस्वरूप कक्षा में कम अंक पाए
घर में कम मिठाई पाई
मैदान में ज्यादा फील्डिंग की
और कॉलेज में तो पूरी दुनिया ही आगे निकल गयी
अतीत से लेकर आज तक
जिद की सच की छोटी सड़क बनाने की हमने
पर वो आये सच का शस्त्र लेकर
और न जाने कब झूट की खाई खोद गए
हमारी सड़क के नीचे
और अचानक एक दिन धस गए हम उसमे
कोशिश की,
बाहर निकले
और फिर से निकल पड़े थोड़ी सच की सड़क बनाने
फिर कोई आया अपनापन का शस्त्र लेकर
साथ में सच्चाई की दुहाई लिए हुए
और न जाने कब झूठ की खाई खोद गए
हमारी सड़क के नीचे
और अनजाने में हम धँस गए
अपनी ही सड़क के नीचे।
अभी भी धसे हुए है।
सोचते है कि क्या होता अगर गांधीजी ने
सच्चाई का कथन ना कहा होता
किताबो ने सच्चाई का जिक्र न किया होता
तब शायद हमने भी सच की सड़क बनाने की जिद न की होती
शायद कोई अपना हमें खाई में न धसा पाता
काश! गांधीजी ने ये कहा न होता।
सदा सच बोलो
पढ़ाया था बचपन में मास्टर जी ने ये
सत्य कड़वा होता है,
सत्य की सदैव जीत होती है,
किताबो में पढ़ा था हमने।
इसी कवायद से काफी कम झूट बोला हमने
फलस्वरूप कक्षा में कम अंक पाए
घर में कम मिठाई पाई
मैदान में ज्यादा फील्डिंग की
और कॉलेज में तो पूरी दुनिया ही आगे निकल गयी
अतीत से लेकर आज तक
जिद की सच की छोटी सड़क बनाने की हमने
पर वो आये सच का शस्त्र लेकर
और न जाने कब झूट की खाई खोद गए
हमारी सड़क के नीचे
और अचानक एक दिन धस गए हम उसमे
कोशिश की,
बाहर निकले
और फिर से निकल पड़े थोड़ी सच की सड़क बनाने
फिर कोई आया अपनापन का शस्त्र लेकर
साथ में सच्चाई की दुहाई लिए हुए
और न जाने कब झूठ की खाई खोद गए
हमारी सड़क के नीचे
और अनजाने में हम धँस गए
अपनी ही सड़क के नीचे।
अभी भी धसे हुए है।
सोचते है कि क्या होता अगर गांधीजी ने
सच्चाई का कथन ना कहा होता
किताबो ने सच्चाई का जिक्र न किया होता
तब शायद हमने भी सच की सड़क बनाने की जिद न की होती
शायद कोई अपना हमें खाई में न धसा पाता
काश! गांधीजी ने ये कहा न होता।
गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014
किसान
मैं एक किसान हूँ,
और आसमान में धान बो रहा हूँ।
लोग मुझे कहते है
अरे पगले आसमान में भी कभी धान नहीं जमता।
मैं पूछता हूँ गेगले धोधले
जब जमीन में भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान क्यों नहीं
और अब तो मैं अड़ गया हूँ
कि दोंनो में से एक होकर रहेगा
या तो धरती से भगवान उखड़ेगा
नहीं तो आसमान में धान जमेगा।
और आसमान में धान बो रहा हूँ।
लोग मुझे कहते है
अरे पगले आसमान में भी कभी धान नहीं जमता।
मैं पूछता हूँ गेगले धोधले
जब जमीन में भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान क्यों नहीं
और अब तो मैं अड़ गया हूँ
कि दोंनो में से एक होकर रहेगा
या तो धरती से भगवान उखड़ेगा
नहीं तो आसमान में धान जमेगा।
बुधवार, 22 अक्टूबर 2014
दीदी
मैंने बचपन से अपनी दीदी को देखा
उसको मालूम था कि दो छोटे भाइयों को कैसे पालना है।
कब किसको लताड़ना है , किसे पुचकारना है।
चोट लगे खेल में तो गेंदे का रस कैसे ढारना है
और पीकर आए हो बाबूजी तो जूते कैसे उतारना है।
मेरी दीदी को मेहमान बढ़ जाने पर चार कप चाय को
छः बनाने का हुनुर मालूम था।
और लिट्टी बनाते हुए, उसमे
भुट्टे भुनाने का गुर भी उसका बहुत खूब था।
मेरी दीदी क्या खूबसूरत थी
हिमालय जैसे उसकी नाक थी
और रंग उसका सुंदरबन में छनती हुई धुप था
सुबह जब हल्दी का उबटन लगाती थी
तो लगता था कनइल का फूल है
शाम को जब दिया जलाएगी
तो मिस्टी मिलेगी ये मुझे मालूम था।
लेकिन एक दिन मेरी दीदी, दीदी से औरत हो गई
अब उस औरत से बहुत दूर था
जिसका कभी मैं कभी आखो का नूर था।
अब घर में गंदले मोज़े मिलते थे
रुमाल सारे गुम थे, आलू में नमक तेज था
रोटिया कच्ची थी, कमिजो में बटन नहीं थे
तकिये में कवर नहीं था, गद्दों में खटमल मौजूद थे
जहाँ गयी थी वो औरत वहां बताते है पिताजी
कि उसका बड़ा रसूख था।
मै सोचता था कि कितना कमीना है वो मुच्छड़
जिसने मेरी दीदी को धोखेबाज बना दिया।
खैर ढेड साल बाद मुझे बताया गया कि मेरी एक भगिनी हुई है।
मेरी दीदी को एक लड़की हुई है तो मै उससे मिलने गया
लेकिन वहां दीदी थी ही नहीं
वहां एक औरत थी,
जिसकी आखों के निचे गढ्ढ़े थे
होठ पर पपड़ियाँ थी
और मॉस बस नाम का मौजूद था
उस औरत की दुनिया थी
उसकी सास
जिसको नहाने के लिए गरम पानी चाहिए
ननद जिसको दुपट्टा आसमानी चाहिए
बूढ़े ससुर
जिसको चाय और हुक्का चाहिए
और एक पति जिसको
ऑफिस के लिए दाना पानी चाहिए
ऐसा लगता था की सबको बस
उसकी जवानी चाहिए।
वो औरत मुझे कमरे के कोने में ले जाकर खूब रोइ
फूट फूट कर रोइ।
मै वापस आ गया
और दो महीने बाद मेरी दीदी को जला दिया गया।
मेरे मज़बूर पिता ने केस चला दिया
और उस केस का बड़ा फायदा रहा
उससे एक वकील का घर चलता रहा
थानेदार को नोटों का बण्डल मिलता रहा
सिविल सर्जन को मिठाइयों का डोला पहुचता रहा।
और मुझे बताया गया की मेरी दीदी बदचलन थी।
लेकिन वो बदचलन कैसे थी ये मुझे पता नहीं चला
क्योंकि उसे मैंने घर के बहार छोड़ियें घर के अंदर भी चलते नहीं देखा
वो तरकारी काटती थी तो बैठकर
कपडे धोती थी तो बैठकर
पोंछा लगाती थी तो बैठकर
तो उसने चलना कब सीखा और उसका चल चलन कैसे ख़राब हुआ ?
Shakti Hiranyagarbha
उसको मालूम था कि दो छोटे भाइयों को कैसे पालना है।
कब किसको लताड़ना है , किसे पुचकारना है।
चोट लगे खेल में तो गेंदे का रस कैसे ढारना है
और पीकर आए हो बाबूजी तो जूते कैसे उतारना है।
मेरी दीदी को मेहमान बढ़ जाने पर चार कप चाय को
छः बनाने का हुनुर मालूम था।
और लिट्टी बनाते हुए, उसमे
भुट्टे भुनाने का गुर भी उसका बहुत खूब था।
मेरी दीदी क्या खूबसूरत थी
हिमालय जैसे उसकी नाक थी
और रंग उसका सुंदरबन में छनती हुई धुप था
सुबह जब हल्दी का उबटन लगाती थी
तो लगता था कनइल का फूल है
शाम को जब दिया जलाएगी
तो मिस्टी मिलेगी ये मुझे मालूम था।
लेकिन एक दिन मेरी दीदी, दीदी से औरत हो गई
अब उस औरत से बहुत दूर था
जिसका कभी मैं कभी आखो का नूर था।
अब घर में गंदले मोज़े मिलते थे
रुमाल सारे गुम थे, आलू में नमक तेज था
रोटिया कच्ची थी, कमिजो में बटन नहीं थे
तकिये में कवर नहीं था, गद्दों में खटमल मौजूद थे
जहाँ गयी थी वो औरत वहां बताते है पिताजी
कि उसका बड़ा रसूख था।
मै सोचता था कि कितना कमीना है वो मुच्छड़
जिसने मेरी दीदी को धोखेबाज बना दिया।
खैर ढेड साल बाद मुझे बताया गया कि मेरी एक भगिनी हुई है।
मेरी दीदी को एक लड़की हुई है तो मै उससे मिलने गया
लेकिन वहां दीदी थी ही नहीं
वहां एक औरत थी,
जिसकी आखों के निचे गढ्ढ़े थे
होठ पर पपड़ियाँ थी
और मॉस बस नाम का मौजूद था
उस औरत की दुनिया थी
उसकी सास
जिसको नहाने के लिए गरम पानी चाहिए
ननद जिसको दुपट्टा आसमानी चाहिए
बूढ़े ससुर
जिसको चाय और हुक्का चाहिए
और एक पति जिसको
ऑफिस के लिए दाना पानी चाहिए
ऐसा लगता था की सबको बस
उसकी जवानी चाहिए।
वो औरत मुझे कमरे के कोने में ले जाकर खूब रोइ
फूट फूट कर रोइ।
मै वापस आ गया
और दो महीने बाद मेरी दीदी को जला दिया गया।
मेरे मज़बूर पिता ने केस चला दिया
और उस केस का बड़ा फायदा रहा
उससे एक वकील का घर चलता रहा
थानेदार को नोटों का बण्डल मिलता रहा
सिविल सर्जन को मिठाइयों का डोला पहुचता रहा।
और मुझे बताया गया की मेरी दीदी बदचलन थी।
लेकिन वो बदचलन कैसे थी ये मुझे पता नहीं चला
क्योंकि उसे मैंने घर के बहार छोड़ियें घर के अंदर भी चलते नहीं देखा
वो तरकारी काटती थी तो बैठकर
कपडे धोती थी तो बैठकर
पोंछा लगाती थी तो बैठकर
तो उसने चलना कब सीखा और उसका चल चलन कैसे ख़राब हुआ ?
Shakti Hiranyagarbha
गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014
Safai karamcharis and Ghantagadi Workers in Thane
Safai
karamcharis and Ghantagadi Workers in Thane
Maharashtra Municipal
Kamgaar Union on behalf of these workers recorded strong protest
against the policy of the Corporation to deny the status of permanent
workers to the Ghantagadi and Safai workers on 30th June 2014 by
staging a 'Dharna' in front of TMC office. Large number of workers
were gathered outside TMC office. TMC in its meeting with workers'
representatives promised to fulfill the demands of the workers.
Worker raised the following demands in front of TMC by staging
protest in front of TMC office:
- That the Ghantagadi and Safai workers should be given wages and other allowances equal to the class IV employees of TMC.
- Ghantagadi and Safai workers should be given safety equipments like rain coat, shoes, gloves, mask, etc.
- Payments to Ghantagadi and Safai workers should be made through cheque and payment slip should be provided to the workers.
- TMC hold an order that workers should be given 21 days paid leaves but till now they have not received any money in the form of encashment of paid leaves. This whole money sums up equal to Rs 5 Crore. Please give record of this money.
- TMC should provide medical facilities to the workers and their families.
Municipal Conservancy Workers in Bombay

In
Bombay, the contract system is in existence from the more than past
15 years in the Municipal Corporation without providing the facility
of water for drinking and washing at the sweeping, landfill sites,
dumping grounds. Workers are denied access to the public
transportation due to their filthy conditions, which were due to
unavailability of water facility at the working site. BMC has not
provided any rest space for contract workers and therefore workers
have to eat their food on the garbage trucks while carrying garbage
to the dumping ground. There is a very high mortality rate among
safai karamcharis in Mumbai due to the poor access to health
facilities. In this vicious circle of poverty, a poor quality of life
for the worker and the family is marked by a struggle to make ends
meet and high indebtedness to moneylenders/contractors, since the
group does not meet the eligibility criteria for accessing
institutional sources of credit.
MANHOLE OR FATALHOLE?
- MANHOLE OR FATALHOLE?
What happened?
The Brihanmumbai Municipal Corporation (BMC) has been cleaning drains
in preparation for the monsoon. For this, the civic body had appointed
contractors to thoroughly clean out storm water drains (SWD) and work
was going on in full swing across the city. The work is undertaken
every year by the BMC to save the city from possible flooding. This
year, contractor RPS Mehta was awarded the contract to clean up storm
water drains at Kalachowkie.
On Thursday, Umakrishnan, Pandian and
Anil Londhe, 24, followed the usual procedures, but did not wait long
enough. They were asked to enter the drain without any safety
equipment like gumboots, hand gloves, masks or oxygen cylinder. The
two, Umakrishnan and Pandian, quickly entered the manhole on
instruction of the supervisor and this haste proved fatal for them.
When they did not return back for quite some time, Londhe was asked to
follow suite and he went inside.
Within seconds Londhe came
rushing out feeling dizzy. But Umakrishnan and Pandian could not make
it out and became unconscious due to inhaling of poisonous gases and
fumes.
They were rushed to KEM Hospital, but both were declared death soon after admission on 20th May 2010.
Where do they come from?
Today slum dwellers make up 60% of Mumbai's population that is
approximately 7 million people. Slum inhabitants constantly have to deal
with issues such as, constant migration, lack of water, no sewage or
solid waste facilities, lack of public transit, pollution and housing
shortages. High mortality rate is also a common problem.
Umakrishnan(24) and Pandian(23) hail from a similar slum area near Ray
road station which is mostly inhabited by natives of Tamil Nadu and a
considerable number of Dalit population stay there. The water problem
here is such that they pay 30rs per drum of water almost every other
day in spite of the fact that they are eligible for free supply of
water through the municipal corporations. Large amount of epidemic has
also taken lives of many people staying here.
Both Umakrishnan
and Pandian had been in the same slum since their grandparents
relocated to Mumbai. They both had not studied beyond 5th standard and
didn’t have any job in hand. They rarely used to work for a living.
Umakrishnan’s family consisted of his wife and a 1 ½ year old child
which was supported by his old mother who used to work at a
construction site. All men in the family – his father and brother - had
died with T.B. Similarly, Pandian was married to a young girl who was
5 months pregnant. They had a love marriage and had married only 1 ½
years back with no opposition from either of the families.
What led them to do this work?
1. Their economic conditions: The poverty forced them to do such
inhuman jobs which nobody else dares to even think about doing it. If
we look at some numbers, at 350 deaths per year from among 22,000
permanent sanitation workers in the BMC, the mortality rate (MR) is 16
for every 1,000 Safai Karamcharis
2. Caste Discrimination: The
word "Dalit" comes from the Marathi language, and means "ground",
"suppressed", "crushed", or "broken to pieces". In the context of
traditional Hindu society, Dalit status has often been historically
associated with occupations regarded as ritually impure, such as any
involving leatherwork, butchering, or removal of rubbish, animal
carcasses, and waste. Dalits work as manual laborers cleaning streets,
latrines, and sewers. This is one of the main reasons why in the first
place they agree to do such jobs because they are then not left with
any other option to earn.
3. Support the family: Both of them had a
family to support and did not have a permanent job in hand. Trying to
earn this minimal amount for cleaning manholes, they took up this job
for the first time through the contractors who pick them up from the
slums.
What is the condition of the family today?
Staying in those small slum houses and with tears rolling down their
faces while talking to them, one thing was clear that there is nothing
compared to the lives of their loved ones. There is no word like
‘compensate’ for them. The families initially were not even aware of the
fact that they were eligible for any financial compensation. Only
when their relatives and few other people told them, they asked for
it. BMC had put down their hands saying that it was the contractor’s
(RPS Mehta) liability and not theirs. Also, initially the contractors
refused to pay any compensation to the families of the victim but due
to little media attention that the case got and repeated demand from
the family, they gave 6 lakhs compensation each towards their wives.
While Uma’s wife took the money with her and went back to her own
family, Pandian’s wife gave 2 lakhs to her mother-in-law and has kept
rest of the money aside for her child yet to be born. However, money is
not the factor that will sustain these families with small children.
They believe that giving jobs to the wives will ensure constant money
in the family. The issue of unemployment in this section of the
society (even hard labor) with no more male support makes them worried
about the sustenance of their lives.
What are the issues in this case?
1. No ownership: Soon after the death of the two workers, the BMC
refused to take any ownership for it. The High Court has given clear cut
guidelines to the BMC, while giving such contracts, but the rules are
hardly followed. Each time there is an accident or casualty, the
guidelines are followed for few months only. Also, without the media
attention and the FIR case, contractors did not bother to own the fact
that it was due to their negligence, lives of those 2 men and many
lives associated with them were ruined.
2. Lack of implementation
of procedures: Even after the High Court order, which directed that no
state departments (municipal corporations, municipalities, gram
panchayats) as well as private person or companies should let any
person enter a manhole to clean it except when it is inevitable —
contractors continue to refute the order. The order further stated that
in such a case, the employer is required to check the extent and
types of gases present in the manhole. If found safe, the employer
should provide equipments like oxygen mask, helmet, gumboot, air
blower, torch, safety belt, etc. while one enters the manhole.
However, in actual, the workers are forced to get into these manholes
without any clothes and without any proper training.
3. Illiteracy
and Poverty: Since illiteracy and poverty are tightly tied up, this
leads to a great amount of ignorance. If only these men knew what they
were entitled for and what are the hazards of going down that manhole
without any safety measures, this case could have been avoided. Also,
while speaking to one of the wives and looking at their bank account
summary, she mentioned she did not understand the figures or what was
written in the death certificate. In such a case, there is a great
possibility of being cheated by the officials or anybody.
What is the solution?
It is not the lack of funds or technology that poses problems. If
technology can be used to launch satellites and the Rs 386- crore
Chandrayaan (the mission to moon), why can it not be used for garbage
and sewage? The Jawaharlal Nehru Urban Renewal Mission (JNURM), hatched
by the Ministry of Urban Development in 2002, envisages spending Rs
1,20,536 crore over seven years on urban local bodies. Of the projects
approved so far under the JNURM, 40 percent have been allotted for
drainage and sewerage work. Why does so much money get spent on
laying/relaying pipes and drains that are designed to kill? India’s
urban planners, designers and technologists have never felt the need to
conceive a human-friendly system of managing garbage and sewage.
Instead, they rely on an unending source of disposable, cheap, Dalit
labour.
Bibliography
1. Mumbai Mirror, 21st May, 2010.
2. Tehelka Magazine, Vol 4, Issue 47, Dated Dec 08 , 2007
Anisha Joseph
I Year, M.A Social Work
Tata Institute of Social Sciences, Mumbai
प्रधानमंत्री श्री नरेंदर मोदी जी को एक सफाई कामगार की गुहार
प्रधानमंत्री श्री नरेंदर मोदी जी को एक सफाई कामगार की गुहार
प्रति
मा.
प्रधानमंत्री,
सर्व
प्रथम मी आपलेप्रधानमंत्रीपदी
निवडून आल्याबद्दल अभिनंदन
करतो. आपणही
एक सर्वसामान्य
कुटुंबातून
येतात, त्यामुळेआपण
पंतप्रधान झाल्यावर न्याय
मिळण्याची एक नवीन उमेद आम्हाला
मिळाली
आहे.
माझेनाव
दादाराव बाबुराव पाटेकर आहे.
मी मुंबईत
चेंबूर भागातल्या एका झोपडपट्टीत
राहतो. मी
१९९७ पासून
बृहन्मुंबई
महानगर पालिकेत (जी
देशातील सर्वात श्रीमंत महानगर
पालिका आहे) सफाई
कामगार म्हणून काम
करत
आहे. मी
एक दलित असून माझेपूर्वजही
अशाच प्रकारची कामेकरत.
प्रती दिनी
मात्र रु४० रोजानेमी ह्या
कामाला
सुरुवात केली. आता
सुमारे१७ वर्षानंतरही माझा
पगार मात्र रु३२९ आहे.
आम्हाला
कामावर कोणत्याही
प्रकारची
सुरक्षा उपकरणेउपलब्ध करून
देण्यात येत नाहीत.
त्याचबरोबर
भविष्य निर्वाह निधी तसेच
आरोग्य
सोयी
पासूनही आम्हाला वंचित ठेवण्यात
येते. आमचेकाम
कचऱ्याशी निगडीत असल्यानेआम्हाला
नेहमीच
वेगवेगळ्या
आजारांचा सामना करावा लागतो.
परंतुमहानगर
पालिकेकडून ह्या संदर्भात
कोणत्याही प्रकारची
आर्थिक
सहाय्यता करण्यात येत नाही.
आजारपणातही
कामावर रजा मिळत नाही.
माझी मुलगी
पहिल्या वर्गात
शिकत
आहे. मी
तिला खूप शिकवूइच्छितो.
परंतुमाझ्या
पगारात मला घरखर्च भागवनही
कठिण जात. त्यामुळे
माझ्या
मुलीचेभवितव्य धोक्यात आहे.
साफ सफाईचेकाम
हेअत्यावश्यक व रोज चालणारेकाम
आहे. त्यानुसार
ह्या
कामावर कंत्राटी पद्धतीनेकामगार
नेमनेगैरकानुनी आहे.
तरीही महानगर
पालिका सर्व कायद्यांना
धाब्यावर
बसवून हजारो कामगारांचेशोषण
करत आहे.
माझ्या
इतर सहकार्यांचेहेच किंवा
ह्याहून अधिक वाईट हाल आहेत.
मुंबई महानगर
पालिकेत आजही कामगार
किमान
वेतानाहून कमी पगारावर काम
करत आहेत. तरी
कंत्राटी पद्धतीनेसफाई काम
बंद करण्याची मी
आपणास
नम्र विनंती करतो.
त्यामुळेदलितांवर
पूर्वापार होणाऱ्या अन्यायास
रोक बसेल आणि त्यांनाही
समाजातील
इतरांशी खांद्याला खांदा
लावून विकास करण्याची संधी
मिळेल.
न्यायाच्या
प्रतीक्षेत देशाचा एक मूक
सेवक!
न्याय
की उम्मीद रखतेहुए देश का एक
मूक सेवक
आपला
नम्र,
दादराव
बाबुराव पाटेकर
बुधवार, 1 अक्टूबर 2014
बॉम्बे
हाई कोर्ट के दलित मज़दूरों
की व्यथा-
BALJEET
बॉम्बे
high कोर्ट
में ६० से अधिक दलित मज़दूर
रोजाना साफ़ सफाई का काम करते
है। हर जगह की तरह हाई कोर्ट
का साफ़ सफाई का काम भी रोजाना
नियमित रूप से चलता है परन्तु
यहाँ काम करने वाले लोगो का
भविष्य केवल एक या दो साल के
लिए टिका होता है। मतलब यू की
इन लोगो को ठेकेदारो के अन्तर्गत
काम करना होता है तथा ठेकेदारो
के बदली होने के साथ साथ इन
सफाई कामगारों को भी निकाल
दिया जाता है। एक अत्यावशयक
तथा नियमित रूप से होने वाले
काम के कारण सफाईं के काम में
कॉन्ट्रैक्ट कामगारों को
रखना गैरकानूनी है।
परन्तु
हाई कोर्ट ने सब कानूनो की
धजिया उड़ाते हुए कामगारों
को अस्थाई तोर पर रखा हुआ है।
केवल इतना ही नहीं ये सभी कामगार
कम से कम मिलने वाली सुविधाओ
से भी वंचित है। कॉन्ट्रैक्ट
कामगारों को मिलने वाली आधी
सुविधाये भी इन्हे नहीं मिलती।
बाकि सब सुविधाये पाना तो
इनके लिए चाँद पर जाने के बराबर
है।
महिला
कामगारों को जहाँ मासिक वेतन
५७०० रुपया मिलता है वही पुरुष
कामगारों को ६२०० रुपया मिलता
है। उच्चतम न्यायालय के अनुसार
महिला तथा पुरुष दोनों को
सामान काम के लिए सामान वेतन
मिलना चाहिए परन्तु यह भी
बॉम्बे हाई कोर्ट कानून को
नजरअंदाज कर रहा है। मुंबई
में मिलने वाला किमान वेतन
३२९ रूपये प्रतिदिन है जो एक
महीने का ८५५४ रूपये बनता है।
हाई कोर्ट में सफाई का काम
करने वाले एक कामगार के शब्दों
में " किमान
वेतन मिलना हर मज़दूर का हक़ है।
पर जब न्याय देने वाले न्यायालय
में ही जब मज़दूरों की ये हालत
हो तो मज़दूर जाए तो खा जाए।
चिकित्सा सुविधा तथा भविष्य
निर्वाह निधि जैसी मुलभुत
सुविधाये मिलना तो सफाई कामगारों
की पहुंच से कोसो दूर है।
ज्यादातर मज़दूरों को इन सब
सुविधाओं का नाम मजाकिया लगता
है। सभी मज़दूरों का काम सुबह
७:३० पर
शुरू होता है जो दोपहर को ३:३०
पर खत्म होता है। एक महिला
मज़दूर पूछने पर अपनी व्यथा
इस कदर जाहिर करती है -
" मैं रोजाना
अपने घर से (जो
की टिटवाला में है) सुबह
५:१० की
ट्रैन से निकलती हु तथा ७:३०
पर मैं हाई कोर्ट पहुचती हूँ।
इस पुरे सिलसिले के बावजूद
भी मुझे सिर्फ ५७०० रूपये
मासिक मिलते है . जिससे
मैं पूरी तरह से अपना घर चलाने
में असमर्थ हूँ। मैं अपने
बच्चो को पढ़ाना लिखाना चाहती
हूँ पर इस महंगाई के ज़माने में
ये सब असंभव है , लगता
है हमारे बच्चो को भी हमारी
तरह दर दर की ठोकरे खानी पड़ेगी।
बहार वाले लोगो को लगता है की
पता नहीं इन लोगो की कितनी
पगार है। परन्तु हमारा दुखड़ा
सुनकर किसी को यकीन ही नहीं
होता।"
ये
सभी मज़दूर दलित समाज से तलूक
रखते है तथा वर्षो से भारतीय
समाज की जटिलता के कारण पीढी
दर पीढी इसी काम को करते आये
है। परन्तु आज भी इन्ही इनके
अधिकार तथा मुलभुत सुविधाओें
से वंचित रखा जाता है। बॉम्बे
हाई कोर्ट जो पीड़ितों को न्याय
देने के लिए जाना जाता है इस
कदर अपने कोर्ट के आँगन में
काम कर रहे कामगारों को भुखमरी
की और धकेल रहा होगा सुनकर
यकीन नहीं होता परन्तु मज़दूरों
की दयनीय स्तिथि का नजारा
रोंगटे खड़ा कर देने वाला होता
है।
मेरी
बॉम्बे हाई कोर्ट के न्यायाधीश
से यही गुजारिश है की इन मज़दूरों
की हालत पर धयान दे तथा उन पर
हो रहे अत्याचार को रोके।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को एक सफाई कामगार की गुहार
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को एक सफाई कामगार की गुहार
प्रिय प्रधामंत्री जी,
सबसे पहले मैं आपको प्रधानमंत्री बनने पर बधाई देना चाहता हूँ। आपका हमारी तरह एक गरीब घर से ताल्लुक रखने के कारण आपकी जीत ने हमारे अंदर न्याय पाने की एक उम्मीद जगाई है।
मेरा नाम दादाराव बाबुराव पाटेकर है तथा मैं मुंबई के चेम्बूर में एक झोपड़पट्टी में रहता हूँ। मैं १९९७ से बृहन्मुंबई महानगर पालिका (जो कि हमारे देश की सबसे अमीर महानगर पालिका है) में एक सफाई कामगार के तोैर पर काम करता हूँ। मैं दलित हूँ। मेरे पूर्वज इसी काम से सम्बन्ध रखते थे। मैंने महानगर पालिका में ४० रुपए से शुरुआत की तथा १७ सालो की मेहनत के बाद भी मेरी पगार ३२९ रुपए है। हमें काम पर किसी तरह का सेफ्टी इक्विपमेंट नहीं मिलता। इसके साथसाथ हमें चिकित्सा, भविष्य निर्वाह निधि से भी वंचित रखा जाता है। हमारा काम कचरे से सम्बंधित होने के कारण हमें अक्सर बिमारियों से जूझना पड़ता है। परन्तु हमें महानगर पालिका से किसी भी प्रकार की आर्थिक मदद नहीं मिलती, हमें बीमार होने की स्तिथी में एक भी छुट्टी नहीं मिलती। मेरे बच्ची पहली कक्षा में है। मैं उसे पढ़ाना चाहता हूँ परन्तु मेरी पगार से घर का खर्च चलना भी मुश्किल है। इससे मेरी बच्ची का भविष्य खतरे में लटका हुआ है। साफ़ सफाई का काम एक अत्यावश्यक तथा रोजाना चलने वाला काम है। जिसकी वजह से साफ़ सफाई के काम पर कॉन्ट्रैक्ट कामगारों को रखना एक गैर कानूनी काम है। महानगर पालिका कानून की धज्जिया उड़ाने में जरा भी नहीं हिचकिचाती जिसकी वजह से हजारो दलितों के घर उज्जड जाते है।
हमारे बाकि सफाई कर्मचारी का भी ये ही या इससे भी बुरा हाल है। मुंबई महानगर पालिका में आज भी कामगार किमान वेतन से कम में काम कर रहे है। यहाँ पर सफाई मज़दूरों की हालत बहुत ही दयनीय है। इसलिए मैं आपसे कॉन्ट्रैक्ट माध्यम को सफाई के काम में बंद करने की गुहार करता हूँ। ताकि दलित समाज पर वर्षो से होते आ रहे जुल्म तथा अत्याचार के कहर को रोका जा सके जिससे दलित भी समाज में बाकि लोगों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल सके।
न्याय की उम्मीद रखते हुए देश का एक मूक सेवक
धन्यवाद
दादाराव बाबुराव पाटेकर
प्रिय प्रधामंत्री जी,
सबसे पहले मैं आपको प्रधानमंत्री बनने पर बधाई देना चाहता हूँ। आपका हमारी तरह एक गरीब घर से ताल्लुक रखने के कारण आपकी जीत ने हमारे अंदर न्याय पाने की एक उम्मीद जगाई है।
मेरा नाम दादाराव बाबुराव पाटेकर है तथा मैं मुंबई के चेम्बूर में एक झोपड़पट्टी में रहता हूँ। मैं १९९७ से बृहन्मुंबई महानगर पालिका (जो कि हमारे देश की सबसे अमीर महानगर पालिका है) में एक सफाई कामगार के तोैर पर काम करता हूँ। मैं दलित हूँ। मेरे पूर्वज इसी काम से सम्बन्ध रखते थे। मैंने महानगर पालिका में ४० रुपए से शुरुआत की तथा १७ सालो की मेहनत के बाद भी मेरी पगार ३२९ रुपए है। हमें काम पर किसी तरह का सेफ्टी इक्विपमेंट नहीं मिलता। इसके साथसाथ हमें चिकित्सा, भविष्य निर्वाह निधि से भी वंचित रखा जाता है। हमारा काम कचरे से सम्बंधित होने के कारण हमें अक्सर बिमारियों से जूझना पड़ता है। परन्तु हमें महानगर पालिका से किसी भी प्रकार की आर्थिक मदद नहीं मिलती, हमें बीमार होने की स्तिथी में एक भी छुट्टी नहीं मिलती। मेरे बच्ची पहली कक्षा में है। मैं उसे पढ़ाना चाहता हूँ परन्तु मेरी पगार से घर का खर्च चलना भी मुश्किल है। इससे मेरी बच्ची का भविष्य खतरे में लटका हुआ है। साफ़ सफाई का काम एक अत्यावश्यक तथा रोजाना चलने वाला काम है। जिसकी वजह से साफ़ सफाई के काम पर कॉन्ट्रैक्ट कामगारों को रखना एक गैर कानूनी काम है। महानगर पालिका कानून की धज्जिया उड़ाने में जरा भी नहीं हिचकिचाती जिसकी वजह से हजारो दलितों के घर उज्जड जाते है।
हमारे बाकि सफाई कर्मचारी का भी ये ही या इससे भी बुरा हाल है। मुंबई महानगर पालिका में आज भी कामगार किमान वेतन से कम में काम कर रहे है। यहाँ पर सफाई मज़दूरों की हालत बहुत ही दयनीय है। इसलिए मैं आपसे कॉन्ट्रैक्ट माध्यम को सफाई के काम में बंद करने की गुहार करता हूँ। ताकि दलित समाज पर वर्षो से होते आ रहे जुल्म तथा अत्याचार के कहर को रोका जा सके जिससे दलित भी समाज में बाकि लोगों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल सके।
न्याय की उम्मीद रखते हुए देश का एक मूक सेवक
धन्यवाद
दादाराव बाबुराव पाटेकर
मंगलवार, 29 जुलाई 2014
http://www.financialexpress.com/old/ie/daily/19990722/ige22050p.html
The interim order follows an exhaustive hearing by the division bench that took almost the entire day since Tuesday. The final order has been reserved for July 30.
The bench is hearing for final disposal a petition filed by the Kachra Vahatuk Shramik Sangh (KVSS) that is pleading that the BMC be directed to abolish contract services for debris removal and absorb the contract workers. The BMC has, however, already finalised new contractors for the work with the earlier contracts expiring in June.
Constituting the second wing of theBMC's waste management programme, these dumping ground workers are hired by contractors, who use their own vehicles and these workers to dispose of the city's garbage. While garbage is collected and disposed of by BMC workers, the debris of roads and buildings and gutter silt are collected by these contract workers. The KVSS however argues that the contract workers also collect and dispose of garbage.
Interwoven in the petition are pleas that these modern day `untouchables' were ill paid and ill kept, where gumboots, gloves and washing facilities are not provided in the dumping ground areas despite court orders.
In fact, as counsel for the union, Colin Gonsalves read out reports of the the various health camps that showed that these workers suffered from chronic bronchitis and other illnesses, Justice Srikrishna remarked that it is surprising that the workers had taken so long to form a union. (The BMC has employed the services of contract workers since 1970). Gonsalves admitted that it was a failure ofthe union movement.
It was also pointed out that the entire system of contract workers is illegal. For one, the BMC, the principal employer, does not have registration under the Contract Labour laws that could enable it to further give contracts to the workers. Second, none of the contractors who hire the workers have individual licences themselves. ``All these years, the workers never had any vouchers, never signed a muster, and never signed against any money paid to them,'' Gonsalves submitted.
He argued that this system suited the BMC since the contractors who were paid according to the trips their vehicles made could fudge the number of trips. ``In the end, it is the city which suffers,'' he stated. The counsel embellished his arguments by the surveys and reports submitted by the labour commissioner, which explicitly stated these lapses and which had advised the BMC to abolish the current practice in July 1998.
So when D H Mehta, special counsel for the BMC stood up to defend his client, JusticeSrikrishna asked him, ``Considering all the lapses, why must we not take the view that these are all sham contracts?''. Mehta argued that the BMC, though belatedly, did apply for a registration under the Contract labour Laws, in 1996. He then combed through the BMC Act and claimed that under the act, garbage removal was an obligatory duty, whereas these contract workers only collected and disposed off `debris', which, he insisted, was not equal to garbage or refuse and were used mainly for landfill. He argued that the high court had no jurisdiction into these ``camouflage contracts'', and it could only remand the matter to the labour commissioner to enquire into.
As far as directions for the abolition of the contract system was concerned, he argued that it was the state government alone that could give the civic body such a direction.
Copyright © 1999 Indian Express Newspapers (Bombay) Ltd.
HC holds out hope for 800 contract workers
EXPRESS NEWS SERVICE
MUMBAI, JULY 21: The Bombay High Court today gave around 800 garbage
disposal contract workers who have been idle since June 1999 hope for
survival. A division bench of Justice M B Ghodeswar and Justice B N
Srikrishna in an interim relief directed that the Brihanmumbai Municipal
Corporation (BMC) ``consider the offer made by the workers that they
will be willing to work under direct supervision of the BMC officers for
cleaning the city, at a minimum wage of Rs 100 per day''.The interim order follows an exhaustive hearing by the division bench that took almost the entire day since Tuesday. The final order has been reserved for July 30.
The bench is hearing for final disposal a petition filed by the Kachra Vahatuk Shramik Sangh (KVSS) that is pleading that the BMC be directed to abolish contract services for debris removal and absorb the contract workers. The BMC has, however, already finalised new contractors for the work with the earlier contracts expiring in June.
Constituting the second wing of theBMC's waste management programme, these dumping ground workers are hired by contractors, who use their own vehicles and these workers to dispose of the city's garbage. While garbage is collected and disposed of by BMC workers, the debris of roads and buildings and gutter silt are collected by these contract workers. The KVSS however argues that the contract workers also collect and dispose of garbage.
Interwoven in the petition are pleas that these modern day `untouchables' were ill paid and ill kept, where gumboots, gloves and washing facilities are not provided in the dumping ground areas despite court orders.
In fact, as counsel for the union, Colin Gonsalves read out reports of the the various health camps that showed that these workers suffered from chronic bronchitis and other illnesses, Justice Srikrishna remarked that it is surprising that the workers had taken so long to form a union. (The BMC has employed the services of contract workers since 1970). Gonsalves admitted that it was a failure ofthe union movement.
It was also pointed out that the entire system of contract workers is illegal. For one, the BMC, the principal employer, does not have registration under the Contract Labour laws that could enable it to further give contracts to the workers. Second, none of the contractors who hire the workers have individual licences themselves. ``All these years, the workers never had any vouchers, never signed a muster, and never signed against any money paid to them,'' Gonsalves submitted.
He argued that this system suited the BMC since the contractors who were paid according to the trips their vehicles made could fudge the number of trips. ``In the end, it is the city which suffers,'' he stated. The counsel embellished his arguments by the surveys and reports submitted by the labour commissioner, which explicitly stated these lapses and which had advised the BMC to abolish the current practice in July 1998.
So when D H Mehta, special counsel for the BMC stood up to defend his client, JusticeSrikrishna asked him, ``Considering all the lapses, why must we not take the view that these are all sham contracts?''. Mehta argued that the BMC, though belatedly, did apply for a registration under the Contract labour Laws, in 1996. He then combed through the BMC Act and claimed that under the act, garbage removal was an obligatory duty, whereas these contract workers only collected and disposed off `debris', which, he insisted, was not equal to garbage or refuse and were used mainly for landfill. He argued that the high court had no jurisdiction into these ``camouflage contracts'', and it could only remand the matter to the labour commissioner to enquire into.
As far as directions for the abolition of the contract system was concerned, he argued that it was the state government alone that could give the civic body such a direction.
Copyright © 1999 Indian Express Newspapers (Bombay) Ltd.
बुधवार, 2 जुलाई 2014
सोमवार, 9 जून 2014
This new caste of contract workers suffers not only at the hands of authorities but also at the hands of society. By creating this whole contract system employers have been very successful in dividing the unity of workers. Very smartly they have segregated permanent workers from the contract workers. Whole caste of contract workers is delved into wall of poverty by our government by not providing labour rights. Contract worker of a particular caste has got a lower place in his caste.
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सरकारी स्कूल अच्छे है ।
यह गाँव का आँगन है । ज्ञान का प्रांगण है । यहाँ मेलजोल है । लोगों का तालमेल है । बिना मोल है फिर भी अनमोल है । इधर-उधर भागता बचपन है । ...

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उसने पूछा - भगवान है ? मैंने कहा - नहीं। उसने कहा - अरे पगले ! उसके बिना इतनी बड़ी दुनिया कैसे चलती? मन ने कहा - उसकी दुनिया कहाँ चली जो ...
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