बुधवार, 12 अक्टूबर 2016
शनिवार, 24 सितंबर 2016
देश के जज्बाती युवाओं के नाम एक खुला पत्र
देश के जज्बाती युवाओं के नाम एक खुला पत्र
मित्रों,
इस खत को लिखते वक़्त ना ही मैं गर्व महसूस कर रहा हूँ और ना ही निराशा। पर हाँ एक अजीब की सिकुडन में फंसा हुआ लगता हूँ। आज जब कभी मैं सोशल मीडिया पर देश के भविष्य की टिप्पणियां पढता हूँ तो मुझे लगता है कि आज का युवा केवल सही और गलत की बंटाधार लड़ाई में बट चूका है। वो शायद अपनी तर्कसंगत वाली पहचान खो चूका है या उसकी सोचने की शक्ति पर पहरा है।
नई सोच की उम्मीदों वाले देश में ही आज सोचने पर पहरा लग गया है और ये पहरा किसी और ने नहीं हम सब ने अपने आप लगाया है। ऐसा नहीं है कि ये कोई नई चीज़ है या इत्तिहास में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। परंतु आज की आधुनिक दुनिया ने सोचने की अक्षमता को कई गुना शक्ति प्रदान की है . ऐसे व्यक्ति जिनको देसी भाषा में भेड़ चाल चलने वाला कहा जाता है एक दायरे में आ गए है। उनको अपने आपको सही करार देने का मौका हाथ में मिला हुआ है। स्तिथि यह है की एक इंसान अपने आपको सही करार देता ही है की उसके दायरे (साझी सोच) वाले लोग उसको महान बताकर उसका प्रचार प्रसार करने लग जाते है। तो वही उसके विपक्षि (विरोधी सोच) वाले लोग उसे झूठा साबित करने में लग जातें है
और यहाँ से शुरू होती है पक्ष विपक्ष की लड़ाई। अगर आप किसी एक दायरे के पक्ष में है तो आपको विपक्षी दल को झूठा साबित करना ही करना है। एक बार भी आप उस पर सोचने का भार नहीं डालना चाहते। अगर आपको लगा कि विपक्ष सचमुच सही है तो मन ही मन बोलोगे - अरे यार ! कह तो सही रहा है लेकिन अपने दायरे का थोड़े ही है। आप या तो उसके विरोध में कहानी चालु रखोगे या उसको सच्चे दिल से ignore मार दोगे।
आज आपने इतिहास को भी इसी तरह बात दिया है और देश के लिए कुर्बानियां देने वाले क्रांतिकारी आपके दायरों में बात गए है .सबने अपनी अपनी सुविधानुसार क्रांतिकारियों पर अपना हक़ कब्ज़ा लिया है। सच्चाई की तह तक जाए बगैर आपने इधर उधर से अपनी सोच वाली सामग्री इकठ्ठा कर उसको अपने हिसाब से इतिहास बना दिया है। और आपके दायरे के लोग उसका प्रचार प्रसार करने में लगे है। सोचिये क्या होता अगर आज़ादी के समय हमारे देश के भविष्य निर्माता इस तरह आपस में एक दूसरे पर कीचड़ उछालकर लड़ रहे होते। ऐसा नहीं है कि वो सब एक सोच रखते थे बल्कि उनके सबके अपने स्वतंत्र मत थे . और उन्होंने अपने मतों की पूरी व्याख्या भी दी है। पर जब देश की बात आती थी तो वो सब अलग-अलग मतों वाले लोग एक साथ आकर बैठते थे और विपक्षी मतों को समझकर ध्यान में रखते हुए सही निर्णय निकालते थे। कुछ लोग बड़ी आसानी से कह देते है कि आज़ादी के तुरंत बाद ऐसा ही होता है, उनके पास एक साथ बैठने के अलावा कोई और चारा नहीं था। हालांकि बहुत से देशों में ऐसा नहीं हुआ और आज वो देश वापस गुलामों की बेड़ियों में जा चुके है।
चलिए मैं आपको इतिहास से वापस वर्तमान मैं लाता हूँ आपके प्रिय नेता के पास। ऐसा लगता है कि आपने किसी एक नेता के बारें में बोलने की आज़ादी का पंजीकरण करा लिया है। अब आपके नेताजी पर जो कोई टिपण्णी करेगा आप उसे तुरंत दायरे में डाल लोगे। अगर आजकल आपको कोई युवा खूश और तंदूरस्त दिखे तो समझ जाना उसके विपक्ष का भरपूर मजाक उड़ाया जा रहा है .
देश का युवा आज गाडी का वो पहिया बन चूका है की उसको राजनीतिक पार्टियां जहाँ ले जाना चाहती है वहां ले जा रही है। राजनीतिक पार्टियों की फिट की हुई चाबियाँ आपकी सोच पर इस कदर आती पालती मारकर बैठ गयी है कि जब वो चाहे, जिधर चाहे, आप उसी वक़्त उधर चलने लग जाते है। जिस तरह गुलाम व्यक्ति नशे में ही अपनी आज़ादी को महसूस कर पाता है उसी तरह एक दूसरे की बुराई या बर्बादी पर ही आपकी आज़ादी की अभिव्यक्ति टिकी हुई है। सलाह देने की औकात तो नहीं रखता पर इतना जरूर कहूंगा कि वो अपनी स्वतंत्र सोच रखे। अपने नेताओं और चहेतों से सवाल करे और अपने विपक्षियों से मुद्दे पर चर्चा करे।
राम-राम
मित्रों,
इस खत को लिखते वक़्त ना ही मैं गर्व महसूस कर रहा हूँ और ना ही निराशा। पर हाँ एक अजीब की सिकुडन में फंसा हुआ लगता हूँ। आज जब कभी मैं सोशल मीडिया पर देश के भविष्य की टिप्पणियां पढता हूँ तो मुझे लगता है कि आज का युवा केवल सही और गलत की बंटाधार लड़ाई में बट चूका है। वो शायद अपनी तर्कसंगत वाली पहचान खो चूका है या उसकी सोचने की शक्ति पर पहरा है।
नई सोच की उम्मीदों वाले देश में ही आज सोचने पर पहरा लग गया है और ये पहरा किसी और ने नहीं हम सब ने अपने आप लगाया है। ऐसा नहीं है कि ये कोई नई चीज़ है या इत्तिहास में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। परंतु आज की आधुनिक दुनिया ने सोचने की अक्षमता को कई गुना शक्ति प्रदान की है . ऐसे व्यक्ति जिनको देसी भाषा में भेड़ चाल चलने वाला कहा जाता है एक दायरे में आ गए है। उनको अपने आपको सही करार देने का मौका हाथ में मिला हुआ है। स्तिथि यह है की एक इंसान अपने आपको सही करार देता ही है की उसके दायरे (साझी सोच) वाले लोग उसको महान बताकर उसका प्रचार प्रसार करने लग जाते है। तो वही उसके विपक्षि (विरोधी सोच) वाले लोग उसे झूठा साबित करने में लग जातें है
और यहाँ से शुरू होती है पक्ष विपक्ष की लड़ाई। अगर आप किसी एक दायरे के पक्ष में है तो आपको विपक्षी दल को झूठा साबित करना ही करना है। एक बार भी आप उस पर सोचने का भार नहीं डालना चाहते। अगर आपको लगा कि विपक्ष सचमुच सही है तो मन ही मन बोलोगे - अरे यार ! कह तो सही रहा है लेकिन अपने दायरे का थोड़े ही है। आप या तो उसके विरोध में कहानी चालु रखोगे या उसको सच्चे दिल से ignore मार दोगे।
आज आपने इतिहास को भी इसी तरह बात दिया है और देश के लिए कुर्बानियां देने वाले क्रांतिकारी आपके दायरों में बात गए है .सबने अपनी अपनी सुविधानुसार क्रांतिकारियों पर अपना हक़ कब्ज़ा लिया है। सच्चाई की तह तक जाए बगैर आपने इधर उधर से अपनी सोच वाली सामग्री इकठ्ठा कर उसको अपने हिसाब से इतिहास बना दिया है। और आपके दायरे के लोग उसका प्रचार प्रसार करने में लगे है। सोचिये क्या होता अगर आज़ादी के समय हमारे देश के भविष्य निर्माता इस तरह आपस में एक दूसरे पर कीचड़ उछालकर लड़ रहे होते। ऐसा नहीं है कि वो सब एक सोच रखते थे बल्कि उनके सबके अपने स्वतंत्र मत थे . और उन्होंने अपने मतों की पूरी व्याख्या भी दी है। पर जब देश की बात आती थी तो वो सब अलग-अलग मतों वाले लोग एक साथ आकर बैठते थे और विपक्षी मतों को समझकर ध्यान में रखते हुए सही निर्णय निकालते थे। कुछ लोग बड़ी आसानी से कह देते है कि आज़ादी के तुरंत बाद ऐसा ही होता है, उनके पास एक साथ बैठने के अलावा कोई और चारा नहीं था। हालांकि बहुत से देशों में ऐसा नहीं हुआ और आज वो देश वापस गुलामों की बेड़ियों में जा चुके है।
चलिए मैं आपको इतिहास से वापस वर्तमान मैं लाता हूँ आपके प्रिय नेता के पास। ऐसा लगता है कि आपने किसी एक नेता के बारें में बोलने की आज़ादी का पंजीकरण करा लिया है। अब आपके नेताजी पर जो कोई टिपण्णी करेगा आप उसे तुरंत दायरे में डाल लोगे। अगर आजकल आपको कोई युवा खूश और तंदूरस्त दिखे तो समझ जाना उसके विपक्ष का भरपूर मजाक उड़ाया जा रहा है .
देश का युवा आज गाडी का वो पहिया बन चूका है की उसको राजनीतिक पार्टियां जहाँ ले जाना चाहती है वहां ले जा रही है। राजनीतिक पार्टियों की फिट की हुई चाबियाँ आपकी सोच पर इस कदर आती पालती मारकर बैठ गयी है कि जब वो चाहे, जिधर चाहे, आप उसी वक़्त उधर चलने लग जाते है। जिस तरह गुलाम व्यक्ति नशे में ही अपनी आज़ादी को महसूस कर पाता है उसी तरह एक दूसरे की बुराई या बर्बादी पर ही आपकी आज़ादी की अभिव्यक्ति टिकी हुई है। सलाह देने की औकात तो नहीं रखता पर इतना जरूर कहूंगा कि वो अपनी स्वतंत्र सोच रखे। अपने नेताओं और चहेतों से सवाल करे और अपने विपक्षियों से मुद्दे पर चर्चा करे।
राम-राम
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016
देशभक्ति का बाजार
देशभक्ति का बाजार
आओं आओं लूट लो
देशभक्ति का बाजार लगा है।
खरीददारों का तो पता नहीं
पर बेचने वालो का हुजूम उमड़ पड़ा है।
भगवा रंग के पैकट में
हिंदुत्व कंपनी के ठप्पे पे
खूब बिक रही है। देशभक्ति।
पहने टोपी और खादी चड्डी
हाथ में लाठी लिए नागपुर वाले
लाला बेच रहा है। देशभक्ति।
बाबाजी के आश्रम की
गौमाता के मूत्र से पवित्र हुई
एकदम शुद्ध शाकाहारी है। देशभक्ति।
आजकल तो काले कोट वाले भी
गद्दी वाले काका के आशीर्वाद से
बेचने लगे है। देशभक्ति।
आओं आओं लूट लो
देशभक्ति का बाजार लगा है
आओं आओं लूट लो
देशभक्ति का बाजार लगा है।
खरीददारों का तो पता नहीं
पर बेचने वालो का हुजूम उमड़ पड़ा है।
भगवा रंग के पैकट में
हिंदुत्व कंपनी के ठप्पे पे
खूब बिक रही है। देशभक्ति।
पहने टोपी और खादी चड्डी
हाथ में लाठी लिए नागपुर वाले
लाला बेच रहा है। देशभक्ति।
बाबाजी के आश्रम की
गौमाता के मूत्र से पवित्र हुई
एकदम शुद्ध शाकाहारी है। देशभक्ति।
आजकल तो काले कोट वाले भी
गद्दी वाले काका के आशीर्वाद से
बेचने लगे है। देशभक्ति।
आओं आओं लूट लो
देशभक्ति का बाजार लगा है
बुधवार, 17 फ़रवरी 2016
बिन ब्याहा बाप बना दिया
कल शाम यूं ही इंटरनेट पर ताकझाक करते हुए एक हास्यकविता देखी. बड़ी मजेदार और जानदार मालूम होती थी. सोचा हास्य कविता को आपके साथ सांझा करूं लेकिन इसके मूल लेखक का नाम नहीं जानता इसलिए जनाब जिसकी भी हो मेरी तरफ से आभार प्रसन्नता से स्वीकार कर ले.
हिन्दी हास्य कविताएं: बाप बना दिया
कई दिनों बाद किसी का फोन आया।
मै बना रहा था सब्जी, उसे छोड़कर उठाया।
उधर से एक पतली सी आवाज आयी हैलो नरेश!
मैंने कहा सॉरी हियर इज मुकेश!
उसने कहा! क्यों बेवकूफ बना रहे हो।
मुझे सब पता है तुम नरेश ही बोल रहे हो।।
मै थोडा गुस्से में बोला! तुम हो कैसी बला।।
मै कैसे तुम्हे समझाऊँ। मुकेश हूँ नरेश को कहाँ से लाऊं।।
उसको मेरी बातों से, हुआ कुछ खटका।
उसने बड़े जोर से, रिसीवर को पटका।।
तब मुझको किचन से, कुछ बदबू सी आयी।
राँग नम्बर के चक्कर में, मैंने सब्जी जलवायी।।
दूसरे दिन फिर, उसका फोन आया।
मै बाथरूम से भागा, दीवार से टकराया।
सिर के बल गिरा, नाक से खून आया।।
फिर भी गिरते पड़ते, फोन उठाया।।
फिर वही आवाज, आयी हैलो नरेश।
मै खीझकर चिल्लाया! नहीं उसका बाप मुकेश।।
उसने कहा अंकल नमस्ते! मैंने भी आशीष दिया-
खुश रह आज तो मै, बच गया मरते मरते।।
वो थोड़ा शरमाई, फिर गिड़गिड़ायी-
अंकल नरेश से बात करा दो, मै पूनम बोल रही हूँ।
मैंने जवाब दिया-
नरेश तो सुबह ही मर गया, अभी दफना कर आ रहा हूँ।।
उसको हुआ कुछ शक। उसने कहा बक॥
अभी कल ही तो दिखा था।
मैंने आह भरी! इतनी जल्दी मरेगा,
क्या मुझको ये पता था।।
आवाज आयी अच्छा अतुल का नम्बर बता दो।
मै रोया! मेरा बेटा मरा है, कम से कम झूठी तसल्ली तो दे दो।।
उसको मेरी बातों में दिखी सच्चाई।
तब उसने अपनी गाथा सुनाई।।
अंकल मुझे आपका दर्द पता है।
पर इसमें मेरी क्या खता है।।
वो था ही इतना कमीना।
बेकार था उसका जीना।।
आपको क्या पता उसने मेरे साथ क्या किया था।
इंडिया गेट पर ही मेरा चुम्मा ले लिया था।।
इसके अलावा भी उसने मुझको ठगा था।
लालकिले पे मेरा पर्स ले भगा था।।
उसकी इस हरकत पर मेरे डैडी ने डांटा।
तो उसने मेरे बाप को भी जड़ दिया चांटा।।
और क्या बताऊँ मै उसकी करतूत।
अच्छा हुआ मर गया आपका कपूत।।
लेकिन मै उसे अब भी नहीं छोडूंगी।
स्वर्ग तो जायेगा नहीं नरक तक खदेड़ूगी।।
मैंने उसको समझाया।
दो चार अवधी बातों का जाम पिलाया।।
और कहा! छोडो भी ये गुस्सा।
खत्म हुआ नरेश का किस्सा।।
मै उससे हूँ शर्मिंदा।
शायद तुम्हारे लिए हूँ जिन्दा।।
मुझसे शादी करोगी? सच कह रहा हूँ
पैर भी दबाऊंगा अगर तुम कहोगी।।
वो गुर्रायी! चुप बुड्ढे, कुछ तो शरम कर।
भगवान से नहीं, मुझसे तो डर।।
तुझे क्या पता मै कितनी खूंखार हूँ।
कलयुग में पूतना का दूसरा अवतार हूँ।।
मै तो अभी तेरे बेटे को ही नहीं छोडूंगी।
तूने कैसे सोचा मै तुझसे रिश्ता जोडूंगी।।
अरे तू! इस धरती पर अभिशाप है।
नरेश तो ठग ही था, तू तो उसका भी बाप है।।
उस दिन ही मैंने, वो फोन कटा दिया।
पर उसने बिन ब्याहा, बाप मुझे बना दिया॥
हिन्दी हास्य कविताएं: बाप बना दिया
कई दिनों बाद किसी का फोन आया।
मै बना रहा था सब्जी, उसे छोड़कर उठाया।
उधर से एक पतली सी आवाज आयी हैलो नरेश!
मैंने कहा सॉरी हियर इज मुकेश!
उसने कहा! क्यों बेवकूफ बना रहे हो।
मुझे सब पता है तुम नरेश ही बोल रहे हो।।
मै थोडा गुस्से में बोला! तुम हो कैसी बला।।
मै कैसे तुम्हे समझाऊँ। मुकेश हूँ नरेश को कहाँ से लाऊं।।
उसको मेरी बातों से, हुआ कुछ खटका।
उसने बड़े जोर से, रिसीवर को पटका।।
तब मुझको किचन से, कुछ बदबू सी आयी।
राँग नम्बर के चक्कर में, मैंने सब्जी जलवायी।।
दूसरे दिन फिर, उसका फोन आया।
मै बाथरूम से भागा, दीवार से टकराया।
सिर के बल गिरा, नाक से खून आया।।
फिर भी गिरते पड़ते, फोन उठाया।।
फिर वही आवाज, आयी हैलो नरेश।
मै खीझकर चिल्लाया! नहीं उसका बाप मुकेश।।
उसने कहा अंकल नमस्ते! मैंने भी आशीष दिया-
खुश रह आज तो मै, बच गया मरते मरते।।
वो थोड़ा शरमाई, फिर गिड़गिड़ायी-
अंकल नरेश से बात करा दो, मै पूनम बोल रही हूँ।
मैंने जवाब दिया-
नरेश तो सुबह ही मर गया, अभी दफना कर आ रहा हूँ।।
उसको हुआ कुछ शक। उसने कहा बक॥
अभी कल ही तो दिखा था।
मैंने आह भरी! इतनी जल्दी मरेगा,
क्या मुझको ये पता था।।
आवाज आयी अच्छा अतुल का नम्बर बता दो।
मै रोया! मेरा बेटा मरा है, कम से कम झूठी तसल्ली तो दे दो।।
उसको मेरी बातों में दिखी सच्चाई।
तब उसने अपनी गाथा सुनाई।।
अंकल मुझे आपका दर्द पता है।
पर इसमें मेरी क्या खता है।।
वो था ही इतना कमीना।
बेकार था उसका जीना।।
आपको क्या पता उसने मेरे साथ क्या किया था।
इंडिया गेट पर ही मेरा चुम्मा ले लिया था।।
इसके अलावा भी उसने मुझको ठगा था।
लालकिले पे मेरा पर्स ले भगा था।।
उसकी इस हरकत पर मेरे डैडी ने डांटा।
तो उसने मेरे बाप को भी जड़ दिया चांटा।।
और क्या बताऊँ मै उसकी करतूत।
अच्छा हुआ मर गया आपका कपूत।।
लेकिन मै उसे अब भी नहीं छोडूंगी।
स्वर्ग तो जायेगा नहीं नरक तक खदेड़ूगी।।
मैंने उसको समझाया।
दो चार अवधी बातों का जाम पिलाया।।
और कहा! छोडो भी ये गुस्सा।
खत्म हुआ नरेश का किस्सा।।
मै उससे हूँ शर्मिंदा।
शायद तुम्हारे लिए हूँ जिन्दा।।
मुझसे शादी करोगी? सच कह रहा हूँ
पैर भी दबाऊंगा अगर तुम कहोगी।।
वो गुर्रायी! चुप बुड्ढे, कुछ तो शरम कर।
भगवान से नहीं, मुझसे तो डर।।
तुझे क्या पता मै कितनी खूंखार हूँ।
कलयुग में पूतना का दूसरा अवतार हूँ।।
मै तो अभी तेरे बेटे को ही नहीं छोडूंगी।
तूने कैसे सोचा मै तुझसे रिश्ता जोडूंगी।।
अरे तू! इस धरती पर अभिशाप है।
नरेश तो ठग ही था, तू तो उसका भी बाप है।।
उस दिन ही मैंने, वो फोन कटा दिया।
पर उसने बिन ब्याहा, बाप मुझे बना दिया॥
रविवार, 14 फ़रवरी 2016
मौन
मौन
श्रदांजलि है
आदर है
समर्पण है
इसलिए मौन हो जाते है हम .
मौन
क्रोध है
अस्थिर है
शोषण है
भयावह है मौन
इसलिए मौन हो जाते है हम
मौन
मृत्यु है, शिथिलता है .
एक अविरोध समर्थन है
इसलिए मौन नहीं होना चाहता मेरा मन .
- शक्ति द्विवेदी
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सरकारी स्कूल अच्छे है ।
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