बुधवार, 1 अक्टूबर 2014


बॉम्बे हाई कोर्ट के दलित मज़दूरों की व्यथा- BALJEET

बॉम्बे high कोर्ट में ६० से अधिक दलित मज़दूर रोजाना साफ़ सफाई का काम करते है। हर जगह की तरह हाई कोर्ट का साफ़ सफाई का काम भी रोजाना नियमित रूप से चलता है परन्तु यहाँ काम करने वाले लोगो का भविष्य केवल एक या दो साल के लिए टिका होता है। मतलब यू की इन लोगो को ठेकेदारो के अन्तर्गत काम करना होता है तथा ठेकेदारो के बदली होने के साथ साथ इन सफाई कामगारों को भी निकाल दिया जाता है। एक अत्यावशयक तथा नियमित रूप से होने वाले काम के कारण सफाईं के काम में कॉन्ट्रैक्ट कामगारों को रखना गैरकानूनी है।
परन्तु हाई कोर्ट ने सब कानूनो की धजिया उड़ाते हुए कामगारों को अस्थाई तोर पर रखा हुआ है। केवल इतना ही नहीं ये सभी कामगार कम से कम मिलने वाली सुविधाओ से भी वंचित है। कॉन्ट्रैक्ट कामगारों को मिलने वाली आधी सुविधाये भी इन्हे नहीं मिलती। बाकि सब सुविधाये पाना तो इनके लिए चाँद पर जाने के बराबर है।
महिला कामगारों को जहाँ मासिक वेतन ५७०० रुपया मिलता है वही पुरुष कामगारों को ६२०० रुपया मिलता है। उच्चतम न्यायालय के अनुसार महिला तथा पुरुष दोनों को सामान काम के लिए सामान वेतन मिलना चाहिए परन्तु यह भी बॉम्बे हाई कोर्ट कानून को नजरअंदाज कर रहा है। मुंबई में मिलने वाला किमान वेतन ३२९ रूपये प्रतिदिन है जो एक महीने का ८५५४ रूपये बनता है। हाई कोर्ट में सफाई का काम करने वाले एक कामगार के शब्दों में " किमान वेतन मिलना हर मज़दूर का हक़ है। पर जब न्याय देने वाले न्यायालय में ही जब मज़दूरों की ये हालत हो तो मज़दूर जाए तो खा जाए। चिकित्सा सुविधा तथा भविष्य निर्वाह निधि जैसी मुलभुत सुविधाये मिलना तो सफाई कामगारों की पहुंच से कोसो दूर है। ज्यादातर मज़दूरों को इन सब सुविधाओं का नाम मजाकिया लगता है। सभी मज़दूरों का काम सुबह ७:३० पर शुरू होता है जो दोपहर को ३:३० पर खत्म होता है। एक महिला मज़दूर पूछने पर अपनी व्यथा इस कदर जाहिर करती है - " मैं रोजाना अपने घर से (जो की टिटवाला में है) सुबह ५:१० की ट्रैन से निकलती हु तथा ७:३० पर मैं हाई कोर्ट पहुचती हूँ। इस पुरे सिलसिले के बावजूद भी मुझे सिर्फ ५७०० रूपये मासिक मिलते है . जिससे मैं पूरी तरह से अपना घर चलाने में असमर्थ हूँ। मैं अपने बच्चो को पढ़ाना लिखाना चाहती हूँ पर इस महंगाई के ज़माने में ये सब असंभव है , लगता है हमारे बच्चो को भी हमारी तरह दर दर की ठोकरे खानी पड़ेगी। बहार वाले लोगो को लगता है की पता नहीं इन लोगो की कितनी पगार है। परन्तु हमारा दुखड़ा सुनकर किसी को यकीन ही नहीं होता।"
ये सभी मज़दूर दलित समाज से तलूक रखते है तथा वर्षो से भारतीय समाज की जटिलता के कारण पीढी दर पीढी इसी काम को करते आये है। परन्तु आज भी इन्ही इनके अधिकार तथा मुलभुत सुविधाओें से वंचित रखा जाता है। बॉम्बे हाई कोर्ट जो पीड़ितों को न्याय देने के लिए जाना जाता है इस कदर अपने कोर्ट के आँगन में काम कर रहे कामगारों को भुखमरी की और धकेल रहा होगा सुनकर यकीन नहीं होता परन्तु मज़दूरों की दयनीय स्तिथि का नजारा रोंगटे खड़ा कर देने वाला होता है।
मेरी बॉम्बे हाई कोर्ट के न्यायाधीश से यही गुजारिश है की इन मज़दूरों की हालत पर धयान दे तथा उन पर हो रहे अत्याचार को रोके।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को एक सफाई कामगार की गुहार


 प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को एक सफाई कामगार की गुहार

प्रिय प्रधामंत्री जी,
सबसे पहले मैं आपको प्रधानमंत्री बनने पर बधाई देना चाहता हूँ। आपका हमारी तरह एक गरीब घर से ताल्लुक रखने के कारण आपकी जीत ने हमारे अंदर न्याय पाने की एक उम्मीद जगाई है।
मेरा नाम दादाराव बाबुराव पाटेकर है तथा मैं मुंबई के चेम्बूर में एक झोपड़पट्टी में रहता हूँ। मैं १९९७ से बृहन्मुंबई महानगर पालिका (जो कि हमारे देश की सबसे अमीर महानगर पालिका है) में एक सफाई कामगार के तोैर पर काम करता हूँ। मैं दलित हूँ। मेरे पूर्वज इसी काम से सम्बन्ध रखते थे। मैंने महानगर पालिका में ४० रुपए से शुरुआत की तथा १७ सालो की मेहनत के बाद भी मेरी पगार ३२९ रुपए है। हमें काम पर किसी तरह का सेफ्टी इक्विपमेंट नहीं मिलता। इसके साथसाथ हमें चिकित्सा, भविष्य निर्वाह निधि से भी वंचित रखा जाता है। हमारा काम कचरे से सम्बंधित होने के कारण हमें अक्सर बिमारियों से जूझना पड़ता है। परन्तु हमें महानगर पालिका से किसी भी प्रकार की आर्थिक मदद नहीं मिलती, हमें बीमार होने की स्तिथी में एक भी छुट्टी नहीं मिलती। मेरे बच्ची पहली कक्षा में है। मैं उसे पढ़ाना चाहता हूँ परन्तु मेरी पगार से घर का खर्च चलना भी मुश्किल है। इससे मेरी बच्ची का भविष्य खतरे में लटका हुआ है। साफ़ सफाई का काम एक अत्यावश्यक तथा रोजाना चलने वाला काम है। जिसकी वजह से साफ़ सफाई के काम पर कॉन्ट्रैक्ट कामगारों को रखना एक गैर कानूनी काम है। महानगर पालिका कानून की धज्जिया उड़ाने में जरा भी नहीं हिचकिचाती जिसकी वजह से हजारो दलितों के घर उज्जड जाते है।
हमारे बाकि सफाई कर्मचारी का भी ये ही या इससे भी बुरा हाल है। मुंबई महानगर पालिका में आज भी कामगार किमान वेतन से कम में काम कर रहे है। यहाँ पर सफाई मज़दूरों की हालत बहुत ही दयनीय है। इसलिए मैं आपसे कॉन्ट्रैक्ट माध्यम को सफाई के काम में बंद करने की गुहार करता हूँ। ताकि दलित समाज पर वर्षो से होते आ रहे जुल्म तथा अत्याचार के कहर को  रोका जा सके जिससे दलित भी समाज में बाकि लोगों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल सके।

न्याय की उम्मीद रखते हुए देश का एक मूक सेवक

धन्यवाद
दादाराव बाबुराव पाटेकर 

सरकारी स्कूल अच्छे है ।

यह गाँव का आँगन है ।  ज्ञान का प्रांगण है ।  यहाँ मेलजोल है ।  लोगों का तालमेल है ।  बिना मोल है फिर भी अनमोल है ।  इधर-उधर भागता बचपन है । ...