बुधवार, 11 दिसंबर 2024

सरकारी स्कूल अच्छे है ।

यह गाँव का आँगन है । 

ज्ञान का प्रांगण है । 

यहाँ मेलजोल है । 

लोगों का तालमेल है । 

बिना मोल है फिर भी अनमोल है । 

इधर-उधर भागता बचपन है । 

चारों और शोर है । 

सामुदायिक है । लोकतान्त्रिक है । 

ये इसका भी है । उसका भी है । 


जोड़ता है अपनों से 

इसका कोई स्वार्थ नहीं । 

गाँव-मोहल्ला की शान है । 

एकता-भाईचारा इसके प्राण है । 

हमारे पूर्वजों ने खून-पसीनों से 

इसके आँगन को सींचा है । 

यहाँ पीढ़ियाँ पढ़ी है । 

सदियों से आगे बड़ी है । 

यहाँ बड़े-बड़े घराने पढे है । 

पढ़कर यहाँ से 

छोटे-2 घराने भी घड़े है । 

ये इसका भी है । उसका भी है । 


ये जो सरकारी स्कूल है । 

अच्छा है । सच सा है । 









रविवार, 28 जून 2020

मुबारक हो! आपकी सरकारी नौकरी लगी है l


हमने जिन्दगी को कितना काम्प्लेक्स बोले तोह टेढ़ा मेढ़ा बना दिया है l गावों में 15-20 हजार में मस्त जिन्दगी गुजर सकती है मगर आजकल हर कोई शर्मा जी के बेटे से compare करने लगा है l मैं ये जानना चाहता हूँ कितना कमाना काफी (enough) होता है? अगर आप लोगों को मालूम हो तो मुझे जरुर बताएगा l चलिए आज सरकारी नौकरी की बात कर लेते है l आपको बचपन से बताया जाता है खूब पढ़ाई लिखाई करो और उस फलाना चाचा की तरह सरकारी अफसर बन जाओ l

Photo credit: Indian Express 
चलिए आपने मेहनत की और 10 lakh लोगों से कशमकश कर सरकारी नौकरी ले ली, तो क्या होता है? क्या आपको चैन की जिन्दगी बिताने का मौका मिल जाता है? answer is no. क्यों अब क्या हुआ? सरकारी नौकरी लगते ही आपको रुतबा दिखाना पड़ेगा और इसके लिए आपको एक बड़ा सा बिना जरुरत वाला मकान बनाना पड़ेगा l चलिए जैसे-तैसे आपने मकान बना लिया l अब आपकी शादी की बारी है, आपकी शादी आपसे तीन गुणा बड़े औकात यानि हौदा वाले घर में होगी l अब क्या है दो चार साल पहले आप एक अलग समाज का हिस्सा थे अब आपका समाज अलग हो गया है l आपकी जिन्दगी आधी तो ससुराल वालों के स्टेटस के लेवल पर होने में चली जाएगी और अब बची जिंदगी बच्चों के पढ़ाने पर l
आप जितने बड़े अफसर आपकी उतनी बड़ी insecurity सीधा-सीधा बोले तो tension l अब बड़ा अफसर छोटे स्कूल में तो बच्चों को नहीं पढ़ा सकता l अब आपकी बची कुची जवानी बच्चों के classmates के स्टेटस के लेवल को maintain करते करते चली जाएगी l
सवाल अभी भी यही है कि अफसर बनकर आपने अपने लिए क्या किया? हम इस सवाल पर discuss करेंगे पर इससे पहले थोडा कॉलेज का भी जिक्र कर लेते है l अगर आप बहुत बड़े अफसर है तो आपके बच्चे विदेश जाएँगे ही जाएँगे l और आधे वही के हो जाएँगे l आधे वापस आएँगे मगर आधे l

अच्छा जैसे ही बच्चों की पढ़ाई पूरी होती है और नौकरी की बात आती है तो क्या होता है ? तब आप एक नया हीरो बनकर उभरते है l आपके पास अथाह वक्त होता है और आप अपनी सालों की मेहनत पर क्रेडिट लेना चालु करते हैl  अब आपको अपनी वीरता, साहस, बुधिमानी पर गर्व होगा l और इस गर्व का स्वाद केवल आप नहीं बल्कि समाज के हर घर में चखा जाएगा l आप अपनी वीरता की उन्माद में इतने मस्त हो जाएँगे कि आपके अपने परिवार में आपके अपने बच्चे उन वीरता की कहानियों के निच्चे कुचले जाएँगे l वो कितना भी कर ले या कुछ भी कर ले वो आपकी वीरता की बराबरी कभी नहीं कर पाएँगे l
और एक दिन थक हारकर वो शर्मा जी के बच्चे बन जाएँगे या जिंदगी भर शर्मा जी बच्चों की वीरता की कहानियां सुनेंगे l
और एक दिन आप जीते हुए, हारे हुए, थके से, अपने से लोगों को अपने सिरहाने पाएंगे और शायद गर्व भी महसूस कर रहे होंगे मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी l  और आपकी मुलाकात अपने नहीं, शर्मा जी के बच्चों से होगी l

सोमवार, 8 जून 2020

हर एक दोस्त कमीना होता है l


आपने ये तो सुना होगा हर एक दोस्त कमीना होता है l मगर मैं कहूँगा कमीना नहीं महा-कमीना होता है l तुम्हारे breakup के बाद इनको तुम्हारी गर्लफ्रेंड सॉरी एक्स गर्लफ्रेंड पर लाइन मारनी होती है l इनको पता है कि ये कन्धा बनेंगे फिर भी बनना है l एक ऐसा ही कन्धा यानि कि मेरा दोस्त मुझसे मिलने आया l उसने कहा - यार बल्ली तूने उसके साथ ठीक नहीं किया l तूने उसके साथ ये ये ये किया l मैं सुनता रहा l फिर उसकी पूरी कहानी सुनने के बाद मैंने कहा भाई उसने मेरे साथ वो वो वो किया l ये सुनने के बाद उसने कहा - ओह! इतना कुछ हुआ? मैंने कहा - नहीं l उसका ये ये ये और मेरा वो वो वो और जो जो हुआ l

अच्छा ऐसा कभी हुआ है ? जब आपके दोस्त ने आपकी बनती बनती बात बिगाड़ दी हो? मतलब दोस्तों को लगता है अगर date करने लग गया तो इनका भाई बर्बाद हो जाएगा जैसे अब बड़ा आबाद है l मेरी एक बार बस बात बनने ही वाली थी l मैं और वो कैंटीन में बैठे चाय पी रहे थे कि इतने में ही मेरा ये दोस्त आता है l अब conversation starter होती है एक्स कि बातें l भाई ये मुझे अब समझ आया है कि दोस्त (लड़का ये लड़की) कभी अपनी एक्स के बारें में मत बताना l बस इसको वार्निंग नहीं वारंट समझ लो और कुछ नहीं कह सकता l
हाँ तो उसने मेरे दोस्त से पुछा - यार बल्ली की एक्स के बारें में बताओ ना l
अब दोस्त को कमीना कहो या महा कमीना होता वो दोस्त ही है l उसने कहा कौनसी वाली के बारें में बताऊँ?
you will not believe वो उसी time वहां से उठ कर चली गई l उसके बाद क्या हुआ ये ना सुनोगे तो अच्छा होगा l

अच्छा कुछ लोग होते है जो बोलते है मुझे उस लड़की ने propose किया इसने propose किया l मुझे आजतक नहीं पता ये सच है या झूठ l मुझे आज तक I Love You जैसे तीन अनमोल शब्द पहले नहीं बोले l और जब-जब मैंने उन्हें बोला तो अगर ना होता है तो तुरंत reply आता है l मतलब भाई ये नजर कौनसी होती है? मतलब हम मिस्टर इंडिया है जो सिर्फ ना की नजरों से दिखते है l और अगर इनको हाँ करनी हो तो कभी सीधे मुंह हाँ नहीं बोलेगी - उसमे एक्स की प्रताड़ना होगी l जो आपके लिए सीधे-सीधे शब्दों में चेतावनी है l
फिर आपको ये बताया जाएगा कि she is not worth you. इसका मतलब ये है आप उनकी तारीफ़ कीजये l अगर आप ये दो पड़ाव पार कर गए तो सोचा जाएगा l अब सोचा जाएगा वो वक़्त है जो आपकी नजरों में गुलाब ही गुलाब बिछाए है मगर आप जब उन पर चलते है तो वो शोला बन जाते है l और जिस दिन हाँ होती है उस दिन आपको लगेगा अ दुनिया वालों मेरे साथ हुआ क्या है ?



अरे बुडबक कौन हो तुम?

अरे बुडबक कौन हो तुम?

अम्म्म! हम है जी बीच के l

क्या ? बीच के ? ये कौन होते है ?

देखो -

ना हम बड़े ना हम छोटे l

ना हम गाँव के ना हम शहर के

ना हम देशी ना हम अंग्रेजी

ना हम आवारा ना हम सुशील

ना हम खिलाडी ना हम अनाड़ी

ना हम अनपढ़ पता नहीं है कैसे पढ़े लिखे

बस बस बस l अरे बाबा ! तुम हो कौन?

ये सोचते सोचते तो हमने 30 साल निकाल दिए l तुझे 2 मिनट में उत्तर चाहिए l (ये ले l ये ले l थप्पड़ से पिटाई)

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

मेरे विचार कुकुरमुत्ता हो गए है



मेरे विचार कुकुरमुत्ता हो गए है

मेरे विचार
हाँ मेरे विचार
कुकुरमुत्ते हो गए है
बस इधर जाते है
उधर जाते है
पता ही नहीं कहाँ कहाँ जातें है?
मेरे विचार
हाँ मेरे विचार
कुकुरमुत्ते हो गए है l

चुनाव का वक़्त है
तो इनकी दोस्त ईमानदारी है
देशभक्ति इनके रंग रंग में है

वैसे ये थोड़े उतावले है
कुछ कानूनी करने के लिए
ये कागज़ सरकाते है
जेब थोड़ी इनकी गरम है
बराबर बाकियों की भी करते है
मेरे विचार
सच्चे, कर्मठ, पक्के
विचार कुकुरमुत्ते हो गए है l

सुना है कुछ दिन पहले
खड़े चोराहे पर
आज़ादी के नारे लगा रहे थे
आज वही अपनी ख़बरों को
फेक न्यूज़ बता रहे है l

संस्कृति इनकी सांस है
ये उठते तो संस्कृति से
बैठते है तो संस्कृति से
सोते भी है तो अपनी संस्कृति से
मगर इनकी संस्कृति जो है
वो इनकी अपनी है
ये मेरे विचार है
जो आजकल कुकुरमुत्ते हो गए है l

जब ये जवान थे
तो गलतियाँ होती थी
मगर अब ये ब्रहमचारी हो गए है
अब आती है शर्म इनको
सोचने में, समझने में
शायद ये मोहमाया छोड़ गए है l


मेरे विचार
हाँ मेरे विचार
कुकुरमुत्ते हो गए है








रविवार, 5 फ़रवरी 2017

मुस्कान

मुस्कान

उसने हमे देखाi
मुस्कराई, थोड़ा शरमाई
और चली गयी !

आयी उनकी मुस्कराहट दौड़कर
सजी हमारे गालों पर
और जा मिली दिल से

अब जब भी वो आती
अपनी मुस्कराहट साथ लाती
जो हमारे गालों पर सजती
और दिल से जा मिलती

इतना सा था हमारा
और उनका रिश्ता
दो जाने पहचाने चेहरे   
दो अनजान लोग
दो अनजान दिल
और एक मुस्कान !!

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

हरिशंकर परसाई | Harishankar Parsai


हरिशंकर परसाई | Harishankar Parsai

ऐसा कभी नहीं हुआ था।

धर्मराज लाखों वर्षों से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफ़ारिश के आधार पर स्वर्ग का नरक के निवास-स्थान 'अलाट' करते आ रहे थे। पर ऐसा कभी नहीं हुआ था।

सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर पर रजिस्टर देख रहे थे। गलती पकड़ में ही नहीं आ रही थी। आखिर उन्होंने खोज कर रजिस्टर इतने जोर से बन्द किया कि मक्खी चपेट में आ गयी। उसे निकालते हुए वे बोले, "महाराज, रिकार्ड सब ठीक है। भोलाराम के जीव ने पाँच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना भी हुआ, पर यहाँ अभी तक नहीं पहुँचा।"

धर्मराज ने पूछा, "और वह दूत कहाँ है?"

"महाराज, वह भी लापता है।"

इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बड़ा बदहवास वहाँ आया। उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था। उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे, "अरे, तू कहाँ रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहाँ है?"

यमदूत हाथ जोड़कर बोला, "दयानिधान, मैं कैसे बतलाऊँ कि क्या हो गया। आज तक मैंने धोखा नहीं खाया था, पर भोलाराम का जीव मुझे चकमा दे गया। पाँच दिन पहले जब जीव ने भोला राम की देह को त्यागा, तब मैंने उसे पकड़ा और इस लोक की यात्रा आरम्भ की। नगर के बाहर ज्योंही मैं उसे लेकर एक तीव्र वायु-तरंग पर सवार हुआ त्योंही वह मेरे चंगुल से छूटकर न जाने कहाँ गायब हो गया। इन पाँच दिनों में मैंने सारा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर उसका कही पता नहीं चला"

दूत ने सिर झुकाकर कहा, "महाराज, मेरी सावधानी में बिल्कुल कसर नहीं थी। मेरे इन अभ्यस्त हाथों से, अच्छे-अच्छे वकील भी नहीं छूट सके। पर इस बार तो कोई इन्द्रजाल ही हो गया।"

चित्रगुप्त ने कहा, "महाराज, आजकल पृथ्वी पर इस प्रकार का व्यापार बहुत चला है। लोग दोस्तों को कुछ चीज भेजते है और उसे रास्ते में ही रेलवेवाले उड़ा लेते हैं। हौजरी के पार्सलों के मोजे रेलवे अफसर पहनते हैं। मालगाड़ी के डब्बे-के-डब्बे रास्ते में कट जाते हैं। एक बात और हो रही है। राजनैतिक दलों के नेता विरोधी नेता को उड़ाकर बन्द कर देते हैं। कहीं भोलाराम के जीव कोभी तो किसी विरोधी के मरने के बाद दुर्गति करने के लिए नहीं उड़ा दिया?"

धर्मराज ने व्यंग्य से चित्रगुप्त की ओर देखते हुए कहा, "तुम्हारी भी रिटायर होने की उम्र आ गयी। भला भोलाराम जैसे नगण्य, दीन आदमी से किसी को क्या लेना-देना?"

इसी समय कहीं घूमते-घामते नारद मुनि वहाँ आ गये। धर्मराज को गुम-सुम बैठे देख बोले, "क्यों धर्मराज, कैसे चिन्तित बैठे है? क्या नरक में निवास-स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई?"

धर्मराज ने कहा, "वह समस्या तो कभी की हल हो गयी। नरक में पिछले सालों से बड़े गुणी कारीगर आ गये हैं। कई इमारतों के ठेकेदार हैं, जिन्होंने पूरे पैसे लेकर रद्दी इमारतें बनायीं। बड़े-बड़े इंजीनियर भी आ गये हैं, जिन्होंने ठेकेदारों से मिलकर पंचवर्षीय योजनाओं का पैसा खाया। ओवरसीयर हैं, जिन्होंने उन मजदूरों की हाज़िरी भरकर पैसा हड़पा, जो कभी काम पर गये ही नहीं। इन्होंने बहुत जल्दी नरक में कई इमारतें तान दी हैं। वह समस्या तो हल हो गयी, पर एक बड़ी विकट उलझन आ गयी है। भोलाराम नाम के एक आदमी की पाँच दिन पहले मृत्यु हुई। उसके जीव को यह दूत यहाँ ला रहा था, कि जीव इसे रास्ते में चकमा देकर भाग गया। इसने सारा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर वह कहीं नहीं मिला। अगर ऐसा होने लगा, तो पाप-पुण्य का भेद मिट जायेगा।"

नारद ने पूछा, "उस पर इनकमटैक्स तो बकाया नहीं था?  हो सकता है, उन लोगों ने रोक लिया हो।"

चित्रगुप्त ने कहा, "इनकम होती तो टैक्स होता। भुखमरा था।"

नारद बोले, "मामला बड़ा दिलचस्प है। अच्छा मुझे उसका नाम, पता तो बताओ। मैं पृथ्वी पर जाता हूँ।"

चित्रगुप्त ने रजिस्टर देखकर बताया, "भोलाराम नाम था उसका। जबलपुर शहर मे घमापुर मोहल्ले में नाले के किनारे एक-डेढ़ कमरे के टूटे-फूटे मकान में वह परिवार समेत रहता था। उसकी एक स्त्री थी, दो लड़के और लड़की। उम्र लगभग साठ साल। सरकारी नौकर था। पाँच साल पहले रिटायर हो गया था मकान का किराया उसने एक साल से नहीं दिया, इसलिए मकान-मालिक उसे निकालना चाहता था इतने में भोलाराम ने संसार ही छोड़ दिया। आज पाँचवाँ दिन है। बहुत सम्भव है कि अगर मकान-मालिक वास्तविक मकान-मालिक है, तो उसे भोलाराम के मरते ही, उसके परिवार को निकाल दिया होगा। इसलिए आपको तलाश में काफी घूमना पड़ेगा।"

माँ-बेटी के सम्मिलित क्रन्दन से ही नारद भोलाराम का मकान पहचान गये।

द्वार पर जाकर उन्होंने आवाज लगायी, "नारायन! नारायन!" लड़की ने देखकर कहा, "आगे जाओ महाराज!"

नारद ने कहा, "मुझे भिक्षा नहीं चाहिए; मुझे भोलाराम के बारे में कुछ पूछताछ करनी है। अपनी माँ को ज़रा बाहर भेजो, बेटी!"

भोलाराम की पत्नी बाहर आयी। नारद ने कहा, "माता, भोलाराम को क्या बीमारी थी?"

'क्या बताऊँ?  गरीबी की बीमारी थी। पाँच साल हो गये, पेंशन पर बैठे, पर पेंशन अभी तक नहीं मिली। हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब आता ही नहीं था और आता, तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले पर विचार हो रहा है। इन पाँच सालों में सब गहने बेचकर हम लोग खा गये। फिर बरतन बिके। अब कुछ नहीं बचा था। फाके होने लगे थे। चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दिया।"नारद ने कहा, "क्या करोगी माँ? उनकी इतनी ही उम्र थी।"

"ऐसा तो मत कहो, महाराज! उम्र तो बहुत थी। पचास-साठ रूपया महीना पेंशन मिलती तो कुछ और काम कहीं करके गुजारा हो जाता। पर क्या करें? पाँच साल नौकरी से बैठे हो गये और अभी तक एक कौड़ी नहीं मिली।"

दुख की कथा सुनने की फुरसत नारद को थी नहीं। वे अपने मुद्दे पर आये,  "माँ यह तो बताओं कि यहाँ किसी से उनका विशेष प्रेम था, जिसमें उनका जी लगा हो?"

पत्नी बोली, "लगाव तो महाराज, बाल-बच्चों से ही होता है।"

"नहीं, परिवार के बाहर भी हो सकता है। मेरा मतलब है, किसी स्त्री------"

स्त्री ने गुर्राकर नारद की ओर देखा। बोली, "कुछ मत बको महाराज! तुम साधु हो, उचक्के नहीं हो। जिन्दगी-भर उन्होंने किसी दूसरी स्त्री को आँख उठाकर नहीं देखा।"

नारद हँसकर बोले, "हाँ, तुम्हारा यह सोचना ठीक ही है। यही हर अच्छी गृहस्थी का आधार है। अच्छा, माता मैं चला।"

स्त्री ने कहा, "महाराज, आप तो साधु हैं, सिद्ध पुरूष है। कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उनकी रुकी हुई पेंशन मिल जाये। इन बच्चों का पेट कुछ दिन भर जाये।"

नारद को दया आ गयी थी। वे कहने लगे, "साधुओं की बात कौन मानता है?  मेरा यहाँ कोई मठ तो है नहीं। फिर भी मैं सरकारी दफ्तर में जाऊँगा और कोशिश करूँगा।"

वहाँ से चलकर नारद सरकारी दफ्तर में पहुँचे। वहाँ पहले ही कमरे में बैठे बाबू से उन्होंने भोलाराम के केस के बारे में बातें की। उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक देखा और बोल, "भोलाराम ने दरख़्वास्तें तो भेजी थीं, पर उन पर वज़न नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गयी होंगी।"

नारद ने कहा, "भई, ये बहुत-से 'पेपर-वेट' तो रखे है। इन्हें क्यों नहीं रख दिया?"

बाबू हँसा - "आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती। दरख़्वास्तें 'पेपर-वेट' से नहीं दबतीं। खैर, आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए।"

नारद उस बाबू के पास गये। उसने तीसरे के पास भेजा, तीसरे ने चौथे के पास, चौथे ने पाँचवें के पास। जब नारद पचीस-तीस बाबुओं और अफसरों के पास घूम आये तब एक चपरासी ने कहा, "महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड़ गये। आप अगर साल-भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहें, तो भी काम नहीं होगा। आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए। उन्हें खुश कर लिया, तो अभी काम हो जायेगा।"

नारद बड़े साहब के कमरे में पहुँचे। बाहर चपरासी ऊँघ रहा था, इसलिए उन्हें किसी ने छेड़ा नहीं। बिना 'विजिटिंग कार्ड' के आया देख, साहब बड़े नाराज हुए। बोले, "इसे मन्दिर-वन्दिर समझ लिया है क्या? धड़धड़ाते चले आये। चिट क्यों नहीं भेजी?"

नारद ने कहा, "कैसे भेजता? चपरासी सो रहा है।"

"क्या काम है?" साहब ने रोब से पूछा।

नारद ने भोलाराम का पेंशन-केस बतलाया।

साहब बोले, "आप है वैरागी। दफ़्तरों के रीति-रिवाज नहीं जानते। असल में भोलाराम ने गलती की। भई, यह भी एक मन्दिर है। यहाँ भी दान-पुण्य करना पड़ता है। आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते है। भोलाराम की दरख़्वास्तें उड़ रही हैं, उन पर वज़न रखिए।"

नारद ने सोचा कि फिर यहाँ वज़न की समस्या खड़ी हो गयी। साहब बोले,  "भई, सरकारी पैसे का मामला है। पेंशन का केस बीसों दफ़्तरों में जाता है। देर लग ही जाती है। बीसों बार एक ही बात को बीस जगह लिखना पड़ता है, तब पक्की होती है। जितनी पेंशन मिलती है, उतने ही स्टेशनरी लग जाती है। हाँ, जल्दी भी हो सकता है, मगर----" साहब रूके।

नारद ने कहा, "मगर क्या?"

साहब ने कुटिल मुसकान के साथ कहा, "मगर वज़न चाहिए। आप समझे नहीं। जैसे आपकी यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वज़न भोलाराम की दरख़्वास्त पर रखा जा सकता है। मेरी लड़की गाना-बजाना सीखती है। यह मैं उसे दे दूँगा।  साधु-सन्तों की वीणा से तो और अच्छे स्वर निकलते हैं।"

नारद अपनी वीणा छिनते देख जरा घबड़ाये। पर फिर सँभलकर उन्होंने वीणा टेबिल पर रखकर कहा, "यह लीजिए। अब जरा जल्दी उसकी पेंशन का आर्डर निकाल दीजिए।"

साहब ने प्रसन्नता से उन्हें कुरसी दी, वीणा को एक कोने में रखा और घण्टी बजायी। चपरासी हाज़िर हुआ।

साहब ने हुक्म दिया, "बड़े बाबू से भोलाराम के केस की फाइल लाओ।"


थोड़ी देर बाद चपरासी भोलाराम की सौ-डेढ़ सौ दरख़्वास्तों से भरी फ़ाइल लेकर आया। उसमें पेंशन के कागजात भी थे। साहब ने फाइल पर का नाम देखा और निश्चित करने के लिए पूछा, "क्या नाम बताया साधुजी आपने?"

नारद समझे कि साहब कुछ ऊँचा सुनता है। इसलिए जोर से बोले, "भोलाराम!"

सहसा फाइल में से आवाज आयी, "कौन पुकार रहा है। मुझे?  पोस्टमैन है? क्या पेंशन का ऑर्डर आ गया?"

नारद चौंके। पर दूसरे ही क्षण बात समझ गये। बोले, "भोलाराम! तुम क्या भोलाराम के जीव हो?"

"हाँ,"  आवाज आयी।

नारद ने कहा, "मैं नारद हूँ। मैं तुम्हें लेने आया हूँ। चलो, स्वर्ग में तुम्हारा इन्तजार हो रहा है।"

आवाज आयी, "मुझे नहीं जाना। मैं तो पेंशन की दरख़्वास्तों में अटका हूँ। यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख़्वास्तें छोड़कर नहीं जा सकता।"

शनिवार, 24 सितंबर 2016

देश के जज्बाती युवाओं के नाम एक खुला पत्र

देश के जज्बाती युवाओं के नाम एक खुला पत्र

मित्रों,
इस खत को लिखते वक़्त ना ही मैं गर्व महसूस कर रहा हूँ और ना ही निराशा। पर हाँ एक अजीब की सिकुडन में फंसा हुआ लगता हूँ। आज जब कभी मैं सोशल मीडिया पर देश के भविष्य की टिप्पणियां पढता हूँ तो मुझे लगता है कि आज का युवा केवल सही और गलत की बंटाधार लड़ाई में बट चूका है। वो शायद अपनी तर्कसंगत वाली पहचान खो चूका है या उसकी सोचने की शक्ति पर पहरा है। 
नई सोच की उम्मीदों वाले देश में ही आज सोचने पर पहरा लग गया है  और ये पहरा किसी और ने नहीं हम सब ने अपने आप लगाया है।  ऐसा नहीं है कि ये कोई नई चीज़ है या इत्तिहास में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। परंतु आज की आधुनिक दुनिया ने सोचने की अक्षमता को कई गुना शक्ति प्रदान की है . ऐसे व्यक्ति जिनको देसी भाषा में भेड़ चाल चलने वाला कहा जाता है एक दायरे में आ गए है। उनको अपने आपको सही करार देने का मौका हाथ में मिला हुआ है। स्तिथि यह है की एक इंसान अपने आपको सही करार देता ही है की उसके दायरे (साझी सोच) वाले लोग उसको महान बताकर उसका प्रचार प्रसार करने लग जाते है। तो वही उसके विपक्षि  (विरोधी सोच) वाले लोग उसे झूठा साबित करने में लग जातें है 
और यहाँ से शुरू होती है पक्ष विपक्ष की लड़ाई। अगर आप किसी एक दायरे के पक्ष में है तो आपको विपक्षी दल को झूठा साबित करना ही करना है। एक बार भी आप उस पर सोचने का भार नहीं डालना चाहते। अगर आपको लगा कि विपक्ष सचमुच सही है तो मन ही मन बोलोगे - अरे यार ! कह तो सही रहा है लेकिन अपने दायरे का थोड़े ही है।  आप या तो उसके विरोध में कहानी चालु रखोगे या उसको सच्चे दिल से ignore मार दोगे।  
आज आपने इतिहास को भी इसी तरह बात दिया है और देश के लिए कुर्बानियां देने वाले क्रांतिकारी आपके दायरों में बात गए है .सबने अपनी अपनी सुविधानुसार क्रांतिकारियों पर अपना हक़ कब्ज़ा लिया है। सच्चाई की तह तक जाए बगैर आपने इधर उधर से अपनी सोच वाली सामग्री इकठ्ठा कर उसको अपने हिसाब से इतिहास बना दिया है। और आपके दायरे के लोग उसका प्रचार प्रसार करने में लगे है। सोचिये क्या होता अगर आज़ादी के समय हमारे देश के भविष्य निर्माता इस तरह आपस में एक दूसरे पर कीचड़ उछालकर लड़ रहे होते।  ऐसा नहीं है कि वो सब एक सोच रखते थे बल्कि उनके सबके अपने स्वतंत्र मत थे . और उन्होंने अपने मतों की पूरी व्याख्या भी दी है। पर जब देश की बात आती थी तो वो सब अलग-अलग मतों वाले लोग एक साथ आकर बैठते थे और विपक्षी मतों को समझकर ध्यान में रखते हुए सही निर्णय निकालते थे। कुछ लोग बड़ी आसानी से कह देते है कि आज़ादी के तुरंत बाद ऐसा ही होता है, उनके पास एक साथ बैठने के अलावा कोई और चारा नहीं था। हालांकि बहुत से देशों में ऐसा नहीं हुआ और आज वो देश वापस गुलामों की बेड़ियों में जा चुके है। 
चलिए मैं आपको इतिहास से वापस वर्तमान मैं लाता हूँ आपके प्रिय नेता के पास। ऐसा लगता है कि आपने किसी एक नेता के बारें में बोलने की आज़ादी का पंजीकरण करा लिया है।  अब आपके नेताजी पर जो कोई टिपण्णी करेगा आप उसे तुरंत दायरे में डाल लोगे। अगर आजकल आपको कोई युवा खूश और तंदूरस्त दिखे तो समझ जाना उसके विपक्ष का भरपूर मजाक उड़ाया जा रहा है . 
देश का युवा आज गाडी का वो पहिया बन चूका है की उसको राजनीतिक पार्टियां जहाँ ले जाना चाहती है वहां  ले जा रही है।  राजनीतिक पार्टियों की फिट की हुई चाबियाँ आपकी सोच पर इस कदर आती पालती मारकर बैठ गयी है कि जब वो चाहे, जिधर चाहे, आप उसी वक़्त उधर चलने लग जाते है। जिस तरह गुलाम व्यक्ति नशे में ही अपनी आज़ादी को महसूस कर पाता है उसी तरह एक दूसरे की बुराई या बर्बादी पर ही आपकी आज़ादी की अभिव्यक्ति टिकी हुई है।  सलाह देने की औकात तो नहीं रखता पर इतना जरूर कहूंगा कि वो अपनी स्वतंत्र सोच रखे।  अपने नेताओं और चहेतों से सवाल करे और अपने विपक्षियों से मुद्दे पर चर्चा करे।  

राम-राम 

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

देशभक्ति का बाजार

देशभक्ति का बाजार

आओं आओं लूट लो
देशभक्ति का बाजार लगा है।
खरीददारों का तो पता नहीं
पर बेचने वालो का हुजूम उमड़ पड़ा है। 


भगवा रंग के पैकट में
हिंदुत्व कंपनी के ठप्पे पे
खूब बिक रही है। देशभक्ति।

पहने टोपी और खादी चड्डी
हाथ में लाठी लिए नागपुर वाले
लाला बेच रहा है। देशभक्ति।

बाबाजी के आश्रम की
गौमाता के मूत्र से पवित्र हुई
एकदम शुद्ध शाकाहारी है। देशभक्ति।

आजकल तो काले कोट वाले भी
गद्दी वाले काका के आशीर्वाद से
बेचने लगे है। देशभक्ति।

आओं आओं लूट लो
देशभक्ति का बाजार लगा है

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

बिन ब्याहा बाप बना दिया

कल शाम यूं ही इंटरनेट पर ताकझाक करते हुए एक हास्यकविता देखी. बड़ी मजेदार और जानदार मालूम होती थी. सोचा हास्य कविता को आपके साथ सांझा करूं लेकिन इसके मूल लेखक का नाम नहीं जानता इसलिए जनाब जिसकी भी हो मेरी तरफ से आभार प्रसन्नता से स्वीकार कर ले.

हिन्दी हास्य कविताएं: बाप बना दिया


कई दिनों बाद किसी का फोन आया।
मै बना रहा था सब्जी, उसे छोड़कर उठाया।

उधर से एक पतली सी आवाज आयी हैलो नरेश!
मैंने कहा सॉरी हियर इज मुकेश!

उसने कहा! क्यों बेवकूफ बना रहे हो।
मुझे सब पता है तुम नरेश ही बोल रहे हो।।

मै थोडा गुस्से में बोला! तुम हो कैसी बला।।
मै कैसे तुम्हे समझाऊँ। मुकेश हूँ नरेश को कहाँ से लाऊं।।

उसको मेरी बातों से, हुआ कुछ खटका।
उसने बड़े जोर से, रिसीवर को पटका।।

तब मुझको किचन से, कुछ बदबू सी आयी।

राँग नम्बर के चक्कर में, मैंने सब्जी जलवायी।।

दूसरे दिन फिर, उसका फोन आया।
मै बाथरूम से भागा, दीवार से टकराया।

सिर के बल गिरा, नाक से खून आया।।
फिर भी गिरते पड़ते, फोन उठाया।।

फिर वही आवाज, आयी हैलो नरेश।
मै खीझकर चिल्लाया! नहीं उसका बाप मुकेश।।

उसने कहा अंकल नमस्ते! मैंने भी आशीष दिया-
खुश रह आज तो मै, बच गया मरते मरते।।

वो थोड़ा शरमाई, फिर गिड़गिड़ायी-

अंकल नरेश से बात करा दो, मै पूनम बोल रही हूँ।
मैंने जवाब दिया-
नरेश तो सुबह ही मर गया, अभी दफना कर आ रहा हूँ।।

उसको हुआ कुछ शक। उसने कहा बक॥

अभी कल ही तो दिखा था।
मैंने आह भरी! इतनी जल्दी मरेगा,

क्या मुझको ये पता था।।

आवाज आयी अच्छा अतुल का नम्बर बता दो।
मै रोया! मेरा बेटा मरा है, कम से कम झूठी तसल्ली तो दे दो।।

उसको मेरी बातों में दिखी सच्चाई।
तब उसने अपनी गाथा सुनाई।।
अंकल मुझे आपका दर्द पता है।
पर इसमें मेरी क्या खता है।।

वो था ही इतना कमीना।

बेकार था उसका जीना।।

आपको क्या पता उसने मेरे साथ क्या किया था।
इंडिया गेट पर ही मेरा चुम्मा ले लिया था।।
इसके अलावा भी उसने मुझको ठगा था।
लालकिले पे मेरा पर्स ले भगा था।।
उसकी इस हरकत पर मेरे डैडी ने डांटा।
तो उसने मेरे बाप को भी जड़ दिया चांटा।।

और क्या बताऊँ मै उसकी करतूत।
अच्छा हुआ मर गया आपका कपूत।।

लेकिन मै उसे अब भी नहीं छोडूंगी।
स्वर्ग तो जायेगा नहीं नरक तक खदेड़ूगी।।

मैंने  उसको समझाया।

दो चार अवधी बातों का जाम पिलाया।।

और कहा! छोडो भी ये गुस्सा।
खत्म हुआ नरेश का किस्सा।।
मै उससे हूँ शर्मिंदा।

शायद तुम्हारे लिए हूँ जिन्दा।।
मुझसे शादी करोगी? सच कह रहा हूँ
पैर भी दबाऊंगा अगर तुम कहोगी।।

वो गुर्रायी! चुप बुड्ढे, कुछ तो शरम कर।
भगवान से नहीं, मुझसे तो डर।।

तुझे क्या पता मै कितनी खूंखार हूँ।

कलयुग में पूतना का दूसरा अवतार हूँ।।

मै तो अभी तेरे बेटे को ही नहीं छोडूंगी।
तूने कैसे सोचा मै तुझसे रिश्ता जोडूंगी।।

अरे तू! इस धरती पर अभिशाप है।
नरेश तो ठग ही था, तू तो उसका भी बाप है।।
उस  दिन  ही  मैंने,  वो फोन कटा दिया।
पर उसने बिन ब्याहा, बाप मुझे बना दिया॥

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

मौन

मौन
श्रदांजलि है
आदर है
समर्पण है
इसलिए मौन हो जाते है हम .

मौन
क्रोध है
अस्थिर है
शोषण है
भयावह है मौन
इसलिए मौन हो जाते है हम

मौन
मृत्यु है, शिथिलता है .
एक अविरोध समर्थन है
इसलिए मौन नहीं होना चाहता मेरा मन .

  • शक्ति द्विवेदी

सोमवार, 27 जुलाई 2015

कला

कल्पना उस कलाकार की ऐसी
कि दुनिया के दायरे में ना आ सकी।
पढ़ा तो पूरी दुनिया ने उसे
मगर कमबख्त किसी की समझ में ना आ सकी।
खरीददार तो थे बहुत उसके
मगर उसके लायक दाम इकट्ठे ना हो सके।

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

हम दोनों

तुम थोड़ी ठण्ड इधर करो
मैं थोड़ी धुप सरकाता हूँ। 
थोड़ा-२ बाँट लेते है दोंनो। 
तुम थोड़ी गिराओ झूठ की दीवारे
मैं थोड़ी सच्चाई बतलाता हूँ। 
थोड़ा थोड़ा बाँट लेते है दोनों। 
पुरानी यादें रुठने लगी है अब तो
आओ कुछ नई यादें बनाते है। 
समय थोड़ा साथ बिताते है दोनों। - Shakti Hiranyagarbha

सच की सड़क

कहा था गांधीजी ने
सदा सच बोलो
पढ़ाया था बचपन में मास्टर जी ने ये

सत्य कड़वा होता है,
सत्य की सदैव जीत होती है,
किताबो में पढ़ा था हमने। 

इसी कवायद से काफी कम झूट बोला हमने
 फलस्वरूप  कक्षा में कम अंक पाए
घर में कम मिठाई पाई
मैदान में ज्यादा फील्डिंग की
और कॉलेज में तो पूरी दुनिया ही आगे निकल गयी

अतीत से लेकर आज तक
जिद की सच की छोटी सड़क बनाने की हमने
पर वो आये सच का शस्त्र लेकर
और न जाने कब झूट की खाई खोद गए
हमारी सड़क के नीचे
और अचानक एक दिन धस गए हम उसमे
कोशिश की,
 बाहर निकले
और फिर से निकल पड़े थोड़ी सच की सड़क बनाने
फिर कोई आया अपनापन का शस्त्र लेकर
साथ में सच्चाई की दुहाई लिए हुए
और न जाने कब झूठ की खाई खोद गए
हमारी सड़क के नीचे
और अनजाने में हम धँस गए
अपनी ही सड़क के नीचे। 
अभी भी धसे हुए है।  

सोचते है कि क्या होता अगर गांधीजी ने
सच्चाई का कथन ना कहा होता
किताबो ने सच्चाई का जिक्र न किया होता
तब शायद हमने भी सच की सड़क बनाने की जिद न की होती
शायद कोई अपना हमें खाई में न धसा पाता
काश! गांधीजी ने ये कहा न होता।

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

किसान

मैं एक किसान हूँ,
और आसमान में धान बो रहा हूँ। 
लोग मुझे कहते है
 अरे पगले आसमान में  भी कभी धान नहीं जमता। 
मैं पूछता हूँ गेगले धोधले
जब जमीन में भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान क्यों नहीं
और अब तो मैं अड़ गया हूँ
कि दोंनो में से एक होकर रहेगा
या तो धरती से भगवान उखड़ेगा
नहीं तो आसमान में धान जमेगा। 

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

दीदी

मैंने बचपन से अपनी दीदी को देखा
उसको मालूम था कि दो छोटे भाइयों को कैसे पालना है।
कब किसको लताड़ना है , किसे पुचकारना है।
चोट लगे खेल में तो गेंदे का रस कैसे ढारना है
और पीकर आए हो बाबूजी तो जूते कैसे उतारना है।
मेरी दीदी को मेहमान बढ़ जाने पर चार कप चाय को
छः  बनाने का हुनुर मालूम था।
और लिट्टी बनाते हुए, उसमे
भुट्टे भुनाने का गुर भी उसका बहुत खूब था।
मेरी दीदी क्या खूबसूरत थी
हिमालय जैसे उसकी नाक थी
और रंग उसका सुंदरबन में छनती हुई धुप था
सुबह जब हल्दी का उबटन लगाती थी
तो लगता था कनइल का फूल है
शाम को जब दिया जलाएगी
तो मिस्टी मिलेगी ये मुझे मालूम था।

लेकिन एक दिन मेरी दीदी, दीदी से औरत हो गई
अब उस औरत से बहुत दूर था
जिसका कभी मैं कभी आखो का नूर था।

अब घर में गंदले मोज़े मिलते थे
रुमाल सारे गुम थे,  आलू में नमक तेज था
रोटिया कच्ची थी, कमिजो में बटन नहीं थे
तकिये में कवर नहीं था, गद्दों में खटमल मौजूद थे

जहाँ गयी थी वो औरत वहां बताते है पिताजी
कि उसका बड़ा रसूख था।
मै सोचता था कि कितना कमीना है वो मुच्छड़
जिसने मेरी दीदी को धोखेबाज बना दिया।

खैर ढेड साल बाद मुझे बताया गया कि मेरी एक भगिनी हुई है।
मेरी दीदी को एक लड़की हुई है तो मै उससे मिलने गया
लेकिन वहां दीदी थी ही नहीं
वहां एक औरत थी,
जिसकी आखों के निचे गढ्ढ़े थे
होठ पर पपड़ियाँ थी
और मॉस बस नाम का मौजूद था
उस औरत की दुनिया थी
उसकी सास
जिसको नहाने के लिए गरम पानी चाहिए
ननद जिसको दुपट्टा आसमानी चाहिए
बूढ़े ससुर
जिसको चाय और हुक्का चाहिए
और एक पति जिसको
ऑफिस के लिए दाना पानी चाहिए
ऐसा लगता था की सबको बस
 उसकी जवानी चाहिए। 
वो औरत मुझे कमरे के कोने में ले जाकर खूब रोइ
फूट फूट कर रोइ।

मै वापस आ गया
और दो महीने बाद मेरी दीदी को जला दिया गया।
मेरे मज़बूर पिता ने केस चला दिया
और उस केस का बड़ा फायदा रहा
उससे एक वकील का घर चलता रहा
थानेदार को नोटों का बण्डल मिलता रहा
सिविल सर्जन को मिठाइयों का डोला पहुचता रहा।
और मुझे बताया गया की मेरी दीदी बदचलन थी।
लेकिन वो बदचलन कैसे थी ये मुझे पता नहीं चला
क्योंकि उसे मैंने घर के बहार छोड़ियें घर के अंदर भी चलते नहीं देखा
वो तरकारी काटती थी तो बैठकर
कपडे धोती थी तो बैठकर
पोंछा लगाती थी तो बैठकर
तो उसने चलना कब सीखा और उसका चल चलन कैसे ख़राब हुआ ?


Shakti Hiranyagarbha

सोमवार, 9 जून 2014


One more caste is born out in our society, caste of 'so called' contract people. Today, at every workplace (both at public and private) we have this new force of contract workers. And each day this force is getting bigger and bigger, and engulfing more number of people into its category. Now, there are castes within this new system of caste and these castes arises because of the difference of the background of the people coming to this new caste system. But for now I would like to comment only on the new caste system of contract workers. These 'so called' contract workers caste started taking new shape mainly after 1991 when India adopted policies of liberalization. Labour laws were loosen up after 1991 and government started declining its role in framing labour policies and in these twenty years one anti labour environment has been created. Now in this new working environment contract workers are suffering at the most. There has been decline in the social, physical and mental growth of the contract workers. This whole contract system can also be compared with the slavery system where people have no rights. Same thing is happening with these workers except that in slavery system workers are harassed through one authority but in the current system workers are harassed by different authorities.
This new caste of contract workers suffers not only at the hands of authorities but also at the hands of society. By creating this whole contract system employers have been very successful in dividing the unity of workers. Very smartly they have segregated permanent workers from the contract workers. Whole caste of contract workers is delved into wall of poverty by our government by not providing labour rights. Contract worker of a particular caste has got a lower place in his caste.

सरकारी स्कूल अच्छे है ।

यह गाँव का आँगन है ।  ज्ञान का प्रांगण है ।  यहाँ मेलजोल है ।  लोगों का तालमेल है ।  बिना मोल है फिर भी अनमोल है ।  इधर-उधर भागता बचपन है । ...